आज से ठीक 15 साल पहले आज ही के दिन एशिया (जापान-कोरिया) में पहली बार हुए वर्ल्ड कप का फाइनल खेला गया था। 30 जून 2002 को हुए इस फाइनल में ब्राजील ने रोनाल्डो के 2 गोल्स की मदद से जर्मनी को 2-0 से हराकर खिताब अपने नाम किया था।
जापान के योकोहामा स्टेडियम में खेले गए इस मैच को देखने के लिए स्टेडियम में लगभग 70 हजार लोग जमा थे तो वहीं टीवी पर इस मैच को अरबों लोगों ने देखा। इस मैच में खेल रहे प्लेयर्स की चमक पूरी दुनिया में फैली थी। यहां तक कि यूपी के छोटे-छोटे जिले जिनका मन बस क्रिकेट में रमता है वह भी रोनाल्डो की अजीबोगरीब हेयरस्टाइल को कॉपी कर चिल्ला रहे थे, वाह कान वाह (ओलिवर कान जर्मन गोलकीपर)।
इस मैच/टूर्नामेंट और इसके बाद फुटबॉल में आए बदलावों की चर्चा आज भी होती है लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि इसी दिन एक और फाइनल खेला गया था। इस मैच के आयोजन स्थल से लगभग पांच हजार किलोमीटर दूर खेले गए इस मैच को देखने के लिए स्टेडियम में लगभग 25,000 लोग जमा थे।
'द अदर फाइनल' के नाम से खेला गया यह मैच दुनिया की दो सबसे 'घटिया' टीमों के बीच खेला गया था। दरअसल साल 2002 के इस वर्ल्ड कप के लिए नीदरलैंड्स की टीम क्वॉलिफाई नहीं कर पाई थी जिसके लिए उसे अपने देशवासियों के गुस्से का सामना करना पड़ा था।
वर्ल्ड कप में अपनी टीम को चियर करने का मौका ना मिलने पर दो डच ऐड-एजेंसी पार्टनर्स जोहान क्रैमर और मैटिएस डे जोंग ने दुनिया की सबसे घटिया टीम खोजने की सोची। इसके पीछे उनका सोचना था कि अगर हमारी टीम (नीदरलैंड्स दुनिया की बेस्ट टीम्स में से एक है) दुनिया की सबसे घटिया टीम नहीं है तो आखिर वो कौन सी टीम है जिसे हम दुनिया की सबसे घटिया टीम कह सकते हैं।
दोनों ने उस वक्त की फीफा रैंकिंग में सबसे निचले नंबर पर मौजूद कैरिबियन आईलैंड मोंटसेरैट और नीचे से सेकेंड भूटान के बीच एक मैच कराने का फैसला किया। इस मैच से पहले भूटान अपने इतिहास में एक भी ऑफिशियल मैच नहीं जीता था जबकि मोंटसेरैट ने सिर्फ दो मैच जीते थे।
मैच के लिए फीफा की अनुमति ली गई और फीफा ने इसे ऑफिशियल फ्रेंडली करार दे दिया। दिन तय किया गया 30 जून और जगह भूटान की राजधानी थिम्पू का चांग्लिमिथांग स्टेडियम। सब तय तो हो गया लेकिन इन दोनों देशों के बीच मैच आयोजित कराना इतना आसान तो नहीं था।
जहां मोंटसेरैट को ज्लावामुखी भड़कने से काफी नुकसान पहुंचा था और हजारों लोगों को द्वीप छोड़ना पड़ा था वहीं भूटान की टीम के पास ना तो मैनेजर था और ना ही प्रॉपर टीम। यहां तक कि मोंटसेरैट द्वीप का इकलौता फुटबॉल स्टेडियम भी इस ज्वालामुखी के गुस्से की भेंट चढ़ गया था।
इनके प्रस्ताव का पहले तो दोनों देशों ने मजाक उड़ाया क्योंकि आमतौर पर इंटरनेशन टीम्स के बीच के मैच ऑर्गनाइज करने के लिए दो देशों की फे़डरेशन प्रयास करती हैं ना कि कोई व्यक्ति। शुरुआत में दोनों ही देशों को लगा कि यह आइडिया रियलिस्टिक नहीं है, दोनों ही देशों के ऑफिशियल्स को लगा कि उनका मजाक बनाया जा रहा है।
और करते भी क्या, यह बेचारे एक दूसरे की फुटबॉल टीम्स तो छोड़िए एक दूसरे को बतौर देश भी सिर्फ नाम से जानते थे। हालांकि मोंटसेरैट काफी आसानी से भूटान तक आने और मैच खेलने के लिए रेडी हो गया। दरअसल वहां की सरकार को यह मैच ज्वालामुखी भड़कने के बाद चर्चा में आए अपने देश की नेगेटिव खबरों को काउंटर करने का अच्छा जरिया लगा।
मैच से तीन हफ्ते पहले डच कोच एरी स्कैंस भागकर भूटान पहुंचे और उन्होंने होम साइड की कमान संभाली। उन्होंने टीम के साथ 4 घंटे डेली का ट्रेनिंग शेड्यूल फिक्स किया और उन्हें मैच के लिए तैयार करना शुरू किया। मैच से पहले दोनों की टीम्स जीत को लेकर आश्वस्त थीं।
जहां भूटान के स्ट्राइकर दिनेश छेत्री ने मैच से पहले कहा कि उनकी टीम 2-0 से जीतेगी वहीं मोंटसेरैट के मिडफील्डर एंटोइने लेक विलिक्स ने दावा किया था कि वह 3-0 से जीतेंगे।
4000 से भी कम आबादी वाले मोंटसेरैट और लगभग 6 लाख की आबादी वाले दुनिया के सबसे खुशहाल देश के बीच हुआ यह मैच 4-0 से भूटान के नाम रहा।







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