Monday, 26 January 2015

IIMC में महत्वहीन भारतीय गणतंत्र


ये है भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) जहां कि भारत के साथ ही विश्व के सुदूर कोनों से भी लोग पत्रकारिता पढ़ने आते हैं। और ये तस्वीर है 26-01-2015 सुबह 11:20 बजे की जहां भारत के हर कोने में गणतंत्र दिवस की धूम थी। हर तरफ झंडारोहण हो चुका था और मिष्ठान्न वितरण के बाद लोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठा रहे थे। हम आईआईएमसी में पढ़ने वाले बच्चे जो कि छात्रावास में रहते हैं। रोज की तरह नाश्ते पर इकट्ठा हुये। आमतौर पर मैं नाश्ता नहीं करता महीनों में कहीं एक बार कर लिया तो कर लिया, लेकिन आज मैं सुबह बहुत जल्दी उठ गया था क्योंकि आज गर्व का दिन था, जश्न मनाने का दिन था। नाश्ते पर मेरी बात हुई नीरज से वो बोला कि यार कोई तैयारी नहीं दिख रही अपने यहां। मैंने कहा यार यहां 15 अगस्त को 11 बजे के बाद ध्वजारोहण हुआ था, हो सकता है आज भी वही हो। फिर संस्थान में उपस्थित कर्मचारियों से बात की तो पता चला कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। थोड़ी निराशा हुई और ज्यादा दुख। फिर हमने सोचा कि 11 बजे तक देख लेते हैं फिर करते हैं जो करना है। लेकिन 11:20 तक कुछ नहीं हुआ तो हम निकल पड़े झंडे की तलाश में। हालांकि मेरी जेब में पड़े हुये आखिरी 200 रुपये इस बात की इजाजत तो नहीं दे रहे थे कि हम ऐसा करें, लेकिन हम निकल पड़े ये सोचकर कि ये दिन बार-बार नहीं आता। मैं,नीरज प्रियदर्शी और हमारे अनन्य सहयोगी महापंडित(राहुल सांकृत्यायन) पैदल नजदीकी बाजार कटवरिया सराय पंहुचे पूरा बाजार छान मारा लेकिन एक अदद झंडा नहीं मिला। हमने वहां चाय पी और विचार किया कि आज तो झंडा लेकर ही चलना है। फिर हम वहां से निकले और पंहुचे बेर सराय लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी झंडा नहीं मिला। वहीं पुराने जेएनयू परिसर में स्थित सीआरपीएफ के कैंप में भी हम पंहुच गये झंडे की खोज में लेकिन, उन्होंने कहा कि उनके पास एक ही झंडा था जो कि फहराया जा चुका है। हम बाहर निकले और फिर महापंडित ने कहा कि यार अब ना बस से चलते हैं मुनीरका। हम उनकी बात मानकर बस में बैठे और मुनीरका पंहुचे वहां की गलियों की खाक छानी बहुत खोजने पर एक जगह झंडा मिला उसे लेकर हम वाया ऑटो संस्थान वापस लौटे। यहां कर्मचारियों ने देखा तो कहा कि आ गये गणतंत्र दिवस मनाकर ? हमने कहा कि नहीं तो अभी तो बाकी है यहीं फहरायेंगे तिरंगा। उन्होंने मना कर दिया कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। लेकिन हम जिद पर थे कि आज तो झंडारोहण करके रहेंगे। वैसे भी अब हम तीन ही नहीं थे हमारे अन्य साथी प्रशांत,जितेश,विकास,चंद्रभूषण,अमन,धर्मेंद्र,अमित,इम्तियाज भी थे। हम जोर-शोर से डंडे की खोज में लग गय जिसे झंडे में लगाया जा सके। फाइनली हमारे साथी इम्तियाज को मिल ही गया डंडा। हमने झंडे को डंडे में लगाया और फिर हमने ऊपर चढ़ने के जुगाड़ की सोची क्योंकि चढ़ने के लिये कोई शॉर्टकट तो है नहीं और ऊपर ताला लगा था। हम अंदर घुसे तो हमें एक सीढ़ी मिल गई बस फिर क्या था? सीढ़ी थी तो छोटी लेकिन हमारे देसी स्पाइडरमैन नीरज उसके सहारे ही चढ़ गये और हमने फिर थोड़ा सा ऊपर चढ़कर झंडा पकड़ाया। अभी ये सब चल ही रहा था कि एक महाशय अंदर से दौड़ते हुये निकले और बोले कि परमीशन कहां है ? बिना परमीशन कैसे कर रहे हो ? और भी तमाम सवाल लेेकर वो कूद पड़े। हमारे महापंडित और अन्य साथियों ने उनसे शब्दों में मुकाबला कर उन्हें निरुत्तर कर दिया फिर भी वो माने नहीं और किसी प्रशासनिक अधिकारी को फोन कर हमारी शिकायत कर दी। लेकिन अधिकारी ने मामले में दखल देने से मना करते हुये कहा कि झंडा ही तो फहरा रहे हैं। कौन सा गलत कर रहे हैं करने दो। हालांकि तब तक हम झंडा फहरा चुके थे।
फिर उन्होंने खुद ही चाभी मंगाई और ताला खुलवाया और हम सारे कॉमरेड ऊपर गये।।
ये तो रही आज के झंडारोहण की कहानी


अब बात करते हैं थोड़ी सामाजिक और संवैधानिक गरिमाओं की।  हर सरकारी संस्थान में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को ध्वजारोहण का प्रावधान है। लेकिन आईआईएमसी हेडक्वार्टर 15 अगस्त को दिन में 11 बजे के बाद, अमरावती में इस साल हुआ ही नहीं बाकी सालों का पता नहीं। 2 अक्टूबर तो खैर स्वच्छता दिवस में निकल गया और 26 जनवरी को तो हद ही हो गई यहां ना तो कोई समारोह ना कुछ गणतंत्र दिवस बस एक छुट्टी बनकर रह गया। वजह पूछने पर गोल मोल जवाब कि यहां नहीं होता,कुछ वजह है, ये है, वो है जाने क्या क्या। लेकिन असल वजह कोई नहीं बता रहा।

कितनी शर्मनाक बात है कि ना तो कोई प्रशासनिक अधिकारी और ना ही महान रूप से एक्टिव रहने वाला आईआईएमसी एलुम्नाई एसोसिएशन (इम्का) इस दिन संस्थान में झंडारोहण करने के लिये आगे आया। जबकि 4-5 दिसंबर 2014 की रात में यहां कुछ शिक्षकों और कुछ छात्रों के सौजन्य से धूम-धाम से बोनफायर का आयोजन हुआ था जहां क्या-क्या हुआ था सबको पता है। और तो और विरोध करने पर मारने-पीटने तक की धमकियां दी गईं। शिकायत करने पर कोई कार्यवाही नहीं की गई अपितु पीड़ित पक्ष को डांट कर चुप करा दिया गया।  24 जनवरी को वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा करना चाहते थे तो उनको ये कहते हुये मना कर दिया गया कि संस्थान सेक्यूलर है यहां बस राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, और 26 जनवरी ही मनाये जाते है। फिर अब आप ही बताओ कि 26 जनवरी क्यों नहीं मनाई गई ? क्या इससे भी देश की सेक्यूलर इमेज को खतरा है? बंद कक्षाओं में एथिक्स और मोरलिटी के लेक्चर देना बहुत आसान है लेकिन आम जीवन में उनका पालन करना बेहद मुश्किल।। यहां आप वामपंथी कविताओं के पोस्टर लगा सकते हैं किसी अनुमति की जरूरत नहीं।लेकिन तिरंगा फहराने के लिये आपको एक दिन पहले आवेदन देना पड़ेगा। पूरा कैंपस धूम्रपान मुक्त है लेकिन यहां शिक्षक छात्रों को और छात्र शिक्षक को सिगरेट के साथ ही वीड का भी लेन-देन करते हैं। गाजा-सीरिया पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं और अपने देश से किसी को कोई लेना देना ही नहीं। आईआईएमसी हॉस्टल के तो कहने ही क्या ? कहने को तो हॉस्टल में रहने वालों के लिये 32 नियम हैं जिनमें नशाखोरी नहीं करने,10 बजे के बाद बाहर तो दूर किसी और के कमरे में जाने की मनाही लिखी है लेकिन यहां लोग पूरी रात बाहर घूमते रहते हैं। नशाखोरी तो बेहद आम बात है यहां। अब ऐसे में सवाल ये है कि आईआईएमसी में पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार की जाती है या नशाखोर, अराजक, और नक्सली विचारधारा को मानने वाले नौजवानों की फौज ??

Saturday, 24 January 2015

अमेरिका कब तक रहेगा ऐसे ही विनम्र

ऐसा पहली बार हो रहा है जब अपने गणतंत्र दिवस पर हम अमेरिका के राष्ट्रपति की मेजबानी करेंगे। वैसे तो हमने कई बार अंकल सैम की मेजबानी की है लेकिन ये पहली बार है जब उनकी मेजबानी हम अकेले कर रहे हैं। जी हां क्योंकि पहले जितनी भी बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर आये उनकी यात्रा बिना इस्लामाबाद गये पूरी नहीं हुई। लेकिन अब चाहे इसे मोदी का दक्षिण एशिया में बढ़ता प्रभुत्व कहें या फिर अमेरिका की अवसरवादी कूटनीति अबकी बार ओबामा भारत आयेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जायेंगे।
असलियत में इसके पीछे वजह साफ दिख रही है कि अमेरिका को पता है कि अब भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना रुख सख्त,बहुत ही सख्त कर लिया है। तो दिखावे के लिये ही सही उसे भी सख्त होना ही पड़ेगा वर्ना इससे भारत अमेरिका के रिश्तों पर बुरा परिणाम पड़ सकता है। जो कि अमेरिका के लिये कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नुकसानदायक होगा। अमेरिका बिल्कुल भी नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान जैसे खुद से लड़ते देश के लिये वो दक्षिण एशिया की उभरती हुई महाशक्ति भारत से रिश्ते खराब करे। वैसे भी अमेरिका को सिर्फ दिखावा ही करना है और हम उसी में खुश हो जाते हैं। उदाहरणस्वरूप एक तरफ तो अमेरिका हाफिज, दाउद पर इनाम घोषित करके पाकिस्तान को उन्हें शरण देने से मना करने और दिखाई देने पर गिरफ्तार करने की बात करता है जिसे पाकिस्तान कभी मानता ही नहीं। फिर भी अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुये उसे आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक अहम सहयोगी मानता है। और अरबों डॉलर की सहायता देता है।
भूतकाल में भारत अमेरिका के रिश्ते काफी हद तक एकतरफा रहे हैं जिसमें भारत की भूमिका हमेशा से छोटे भाई की रही है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि अमेरिका भारत को लगभग बराबरी का दर्जा देता हुआ दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गणतंत्र दिवस पर आने के लिये भेजे गये आमंत्रण को ओबामा ने एक बार में स्वीकार करने के साथ ही यहां आने में जो गर्मजोशी दिखाई है उसके कई मायने हैं। दक्षिण एशिया में मुख्यत: चीन का दबदबा है जो कि अमेरिका का शर्तिया प्रतिद्वंदी है और अमेरिका को अच्छे से पता है कि सिर्फ भारत ही चीन को यहां टक्कर दे सकता है। और उसके व्यावसायिक तथा कूटनीतिक हितों की रक्षा कर सकता है। वर्ना ये वही अमेरिका है जिसका नेवी बेड़ा 1971 में अरब सागर तक आ गया था। और 11-13 मई 1998 के परमाणु विस्फोटों  के बाद जिसने भारत पर तमाम तरह के प्रतिबंध लादने में जरा भी देर नहीं लगाई थी।
दूसरी तरफ अगर अमेरिका के इस कदम को वैश्विक स्तर पर देखें तो पता चलता है कि अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ भारत के रिश्ते पहले जैसे नहीं हैं। और अमेरिका इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसीलिये ओबामा ना सिर्फ भारत आने के लिये तैयार हुये बल्कि उन्होंने पाकिस्तान ना जाने और ही रक्षा तथा जलवायु समझौते करने के पर भी फोकस किया है। जबकि आमतौर पर ऐसे समझौतों के लिये अमेरिका सामने वाले देश से कम ही रुचि दिखाता है।

यहां पर ये देखना दिलचस्प होगा कि भारत अमेरिका के रिश्तों में ये गर्माहट कब तक बनी रहती है। क्योंकि रूस इतनी आसानी से भारत से अपनी दोस्ती नहीं तोड़ेगा और रूसी राष्ट्पति पुतिन जिस तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों को ठेंगे पर रखते हैं उसे देखते हुये अमेरिका का इतना विनम्र व्यवहार बहुत दिनों तक तो नहीं रह सकता।

Monday, 5 January 2015

क्या सिर्फ यही सच है ?

राज 23-24 साल का एक युवा जिसके लिये सिगरेट का धुंआ ऑक्सीजन से ज्यादा जरूरी है, शराब नसों में बहती है खून की तरह और कानून रहता है ठेंगे पर। अपराधी नहीं है लेकिन फिर भी उसके लिये कानून की वही हैसियत जो आज की मीडिया के लिये एथिक्स की है। मैं उससे मिला तो हमेशा की तरह वो शराब और सिगरेट से लबरेज था। साथ बैठे तो बातचीत शुरू हुई..।

मैं—क्या यार क्यों हमेशा ऐसे ही नशे में डूबे रहते हो
?
राज- नशे में कौन नहीं है ?, नेता पावर के नशे में, पुलिस रिश्वत के नशे में, मीडिया टीआरपी के नशे में।

मैं- अरे यार ये फिलॉसफी ना करो बताओ ना ऐसा क्यों है?
राज- क्या बताऊं? छोटा था तो परिवार को हमेशा डर लगा रहता था कि अगर अच्छे नंबर ना आये तो क्या होगा? टीनएजर हुआ तो अच्छी नौकरी ना मिली तो क्या होगा? गर्लफ्रेंड भी बनी तो उसकी अलग दिक्कतें ये करो ये ना करो।

मैं- अच्छा ? फिर
राज- फिर क्या किसी तरह से 10+2 किया फिर बीए करने की कोशिश की, लेकिन हो नहीं पाया, तो ग्रेटर नोएडा आ गया घर से लड़ाई करके एनीमेटर बनने। वहां कुछ लोगों ने अलग ही सब्जबाग दिखाकर मास कॉम में एडमिशन करा दिया। बड़ी अच्छी फील्ड है बड़ा पैसा और ग्लैमर है ब्लॉ-ब्लॉ 
बोलकर। पहले साल तो खूब मजा आया लेकिन समझ भी आने लगा कि बेटा, हमसे ना हो पायेगा।

मैं- ऐसा क्या? लेकिन क्यों?
राज- यार सीनियर्स को भटकते देखा नौकरी के लिये, जिसे नौकरी मिल गई वो सैलरी के लिये मरा 
जा रहा था, छुट्टियों जैसा कुछ होता ही नहीं मीडिया में, ये भी दिखने लगा।

मैं- हां सही कह रहे हो यार। फिर?
राज- सेकेंड इयर के पेपर्स खत्म हुये तो कोशिश की इंटर्नशिप पाने की, कुछ जगहों से बुरी तरह से भगाया गया बेइज्जत करके, फिर एक दिन एक रीजनल न्यूज चैनल से कॉल आई और इंटर्नशिप लग गई, फिर शुरू हुई असली दिक्कतें। सुबह 11 बजे जाना फिर वापस आते आते 10-11 बज ही जाते थे। धीरे-धीरे इंटर्नशिप खत्म हुई और नौकरी मिल गई, फिर कुछ ही दिनों बाद एक नेशनल चैनल से फोन आया और मैं वहां पंहुच गया..।

मैं--अरे वाह ये तो बहुत अच्छी बात है इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में?
राज- हंसने लगा और बोला - सही कह रहे हो इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में, ये कहते हुये उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। खैर उसने आगे शुरू किया। वहां कुछ ही दिन बीते थे कि मुझे नाइट शिफ्ट में डाल दिया गया और लगभग नौ महीने तक लगातार मैं नाइट शिफ्ट में ही रहा।
इसी बीच थर्ड इयर के पेपर्स और आईआईएमसी का इंट्रेंस और फिर इंटरव्यू भी हो गया। सेलेक्शन तो पक्का था ही क्योंकि मुझे खुदपर भी यकीन था और उन पर भी जिन्होंने मुझे प्रेरित किया था यहां के लिये ट्राई करने के लिये।

और फिर एक दिन ऑफिस में जैसा कि अक्सर होता है बिना गॉडफादर वालों के साथ, सीनियर नें बिना गलती के चिल्लाना और गाली देना शुरू कर दिया और अपनी आदत से मजबूर मैंने भी जवाब के साथ ही नौकरी को भी लात मार दी। और फिर कुछ दिन खाली बैठा, फिर यहां आईआईएमसी में। इतना कहकर राज तो चुप हो गया लेकिन, मैं सोचने लगा।

मीडिया जो खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते नहीं थकता, लोगों की आवाज होने का दंभ भरने वाले ये बड़े-बड़े मीडिया संस्थान सबकी कमियां तो उजागर करते हैं लेकिन जब बात खुद पर आती है तो अजीब सी चुप्पी इख्तियार कर लेते हैं। सैलरी के नाम पर चंद सिक्के पकड़ा देना, काम के घंटों का कुछ पता नहीं, जिसका जैसा जुगाड़ उसको उतनी सहूलियत। छुट्टी मांगो तो लगता है कि जैसे भीख मांग रहे हैं, वीकऑफ मिलेगा या नहीं कुछ पता नहीं। पेड न्यूज और विज्ञापन ही हर बुलेटिन और खबर का भविष्य तय करते हैं।

संपादकों की जगह अब मैनेजरों की भर्ती होती है, चाहे वो एक लाइन भी ना लिख पाये लेकिन उसे विज्ञापन खींचना और टीआरपी लाना आना चाहिये।


दर्शकों की मांग के नाम पर अश्लीलता फैलाने को अपना धर्म समझते हैं ये लोग। सब के काम में कमी निकालने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने वाले इन लोगों को अपने काम में कमी निकालने वाला लोकतंत्र के ही खिलाफ लगने लगता है और वो इसे सीधे सीधे सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दे देते हैं।

हालात ये हैं कि मीडिया पर कुछ अच्छा लिखना चाहो तो गूगल देवता की शरण में जाना पड़ता है। आम आदमी को लगता है कि मीडिया दलाल है, चोर है, पथभ्रष्ट है, और ऐसा लगने की वजह भी है, मीडिया जब चाहे किसी को भी हीरो बना देता है और जिसे चाहे विलेन। उदाहरस्वरूप चाहे वो दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना का मामला हो या फिर हालिया आम चुनावो में नरेंद्र मोदी की विजय। ये सब मीडिया मैनेजमेंट की ही देन है।

एक तरफ मीडिया फर्जी बाबाओं के खिलाफ खबर चलाता है तो वहीं दूसरी तरफ संत गुरमीत राम रहीम जी इंसा और निर्मल बाबा के सत्संग भी। फर्जी डॉक्टरों, दवाइयों के खिलाफ खबर चलेगी और फिर आधे घंटे का किसी फर्जी हकीम, डॉक्टर या स्वास्थ्य वर्धक गोली, पाउडर, वजन घटाओ चाय, बेल्ट और च्यवनप्राश का प्रचार क्या इसके पीछे पैसे के अलावा और कुछ जिम्मेदार हो सकता है ? 

ऐसा नहीं है कि ये हालात किसी एकाएक बने हैं बल्कि अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि कुछ खास लोग जो कि मीडिया में ऊंचे- ऊंचे पदों पर बैठे हैं सब उन्हीं की महत्वाकांक्षाओं का नतीजा है जो पावर और पैसा के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं और विडम्बना तो ये है कि इसमें सुधार की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।

Sunday, 7 December 2014

IIMC में बढ़ता कदाचार

बरसों से सुनते आ रहे हैं कि पत्रकारिता की पढ़ाई के लिये एशिया में इससे अच्छी जगह नहीं है। लेकिन जब यहां आये तो देखा कि यहां तो अलग ही माहौल है, शिक्षा को तो दूसरा दर्जा मिला हुआ है। पहले दर्जे पर कदाचार है यहां। कुछ लोग हैं जिन्हें ना तो पत्रकारिता से मतलब है और ना ही सामाजिक तानेबाने से उनके लिये बस वही सही है जो वो करें बाकी सब बकवास। और अफसोस तो ये है कि ऐसे लोगों में सिर्फ छात्र ही नहीं है अपितु कुछ शिक्षक भी हैं औऱ सारा रायता उन्हीं का फैलाया हुआ है। उनकी कक्षा में अभिवादन पर पाबंदी है, क्योंकि ये सामंतवादी है। वो बच्चों से मांगकर सिगरेट पीेते हैं और पिलाते हैं क्योंकि उनकी नजर में ये सही है।
मुझे उनकी नजर और समझ से कोई आपत्ति नहीं है ना ही मुझे कोई हक है कि मैं उन्हें गलत साबित करूं। मैं तो बस ये कहना चाहता हूं कि आपके लिये जो सही है वो करो मेरे लिये जो सही होगा में वो करुंगा। शुक्रवार 5 दिसंबर को आईआईएमसी कैंपस में बोन फायर हुआ, मुझे कोई दिक्कत नहीं है ऐसे किसी भी समारोह से जिससे आपस में प्यार बढ़े और लोगों को आनन्द आये लेकिन, छात्र और शिक्षकों का खुले में साथ बैठकर शराब पीना और गाली गलौज करना ये मुझे नहीं पसंद। और में इसपर आपत्ति दर्ज कराउंगा फिर चाहे किसी को बुरा लगे या भला। और भारतीय संविधान की धारा 19-1 (क) के तहत मैंने फेसबुक पर लिखकर विरोध भी जताया। बस फिर क्या था सारे मॉडर्न लोगों को मिर्ची लग गई और फिर शुरू हुआ काउंटर अटैक। कुतर्कों की झड़ी लग गई जिसे नहीं पसंद वो ना आये, हम बच्चे नहीं हैं, मोरल पुलिसिंग मत करो वगैरह वगैरह। लंबे लंबे स्टेटस आने लगे और कमेंट का सिलसिला शुरू हो गया, वहीं पर एक मोहतरमा ने लिखा कि हम एलीट हैं क्योंकि हमें अंग्रेजी आती है। ये अंग्रेजी कब से एलीट होने का पैमाना हो गई ? एक और कमेंट था व्हाट द फक इज गोइंग ऑन ? मोहतरमा क्या आपने कभी अपने अभिभावकों से पूछा है ? व्हाट द फक दे हैड डन बिफोर ?
यही नहीं काउंटर अटैक में हमारा ही स्टेटस शेयर कर उसपे लिख रहे हैं तुमसे ना हो पायेगा औऱ फिर वहां एकत्रित होकर कमेंट कर के मजे ले रहे हैं, कमेंट आ रहे हैं - हैव सम लाइफ यार। ये कैसी लाइफ है जिसमें ना संस्कार हैं और ना ही बड़े छोटे का शर्म लिहाज ? हमें नहीं चाहिये ये लाइफ ये आप को ही मुबारक हो। रही बात मोरल पुलिसिंग की तो उसका भी सभी को पता है कि कैसे कैसे कुकर्म होते हैं कैंपस में और एक बार किसी ने रोकने की कोशिश की तो उसे उल्टा ही फंसा दिया गया था कि वो लड़कियों की फोटो खींचता है। हम भी यहां पढ़ने ही आये हैं बस फर्क इतना ही है कि हमें अच्छे बुरे का भान है और हम उसे ध्यान में रखते हुये ही कोई कदम उठाते हैं। और हमें ये भी पता है कि आप अपनी बिरादरी में हमें किस नाम से बुलाते हैं पिछड़े लोग, पितृसत्ता के पक्षधर, काउ बेल्ट के रहने वाले, गंवार वगैरह वगैरह। लेकिन एक बात साफ समझ लीजिये मान्यवरों सारे नर और नारियों जो परीक्षा पास करके आप यहां आये हैं वही परीक्षा हमने भी पास की है। ना तो समझदारी में ना ही तर्क वितर्क में आपसे पीछे हैं। हां ये जरूर हो सकता है कि हमारे मां बाप शायद आपके मां बाप से कम पैसे वाले होंगे लेकिन हमारे लिये ये गर्व का विषय है क्योंकि अगर उनके पास भी इतना पैसा होता तो हम भी यहां पढ़ाई के सिवा सारे काम करने ही आते। हमें इस पर शर्म नहीं आती। और ना ही हमें मूल्यों,संस्कारों, संस्कृति,संस्कृत की बात करने में शर्म आती है। क्योंकि हम लेनिन, माओत्से तुंग, फिदेल कास्त्रो की बजाय भगत,आजाद और सुभाष की बात करते हैं। उनकी तरह देश हित में कुर्बान होने में हमें गर्व होगा। ना कि साम्यवाद का नारा लगाते हुये जी भर के दारू पीकर गाली-लगौज और हंगामा करने में। आपके पीने से हमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कुछ चीजें बंद कमरों में ही अच्छी लगती हैं। और हां एक बात तो छूट ही जा रही है मेरे किसी भी लेख में मैंने किसी व्यक्तिविशेष को तब तक निशाना नहीं बनाया जब तक कि व्यक्तिगत तरीके से मुझे निशाने पर नहीं लिया गया। इसलिये मैं ये उन्हें जो कि आज मेस में मुझे समझा रहे थे बताना चाहता हूं कि तुम कौन हो कि जिससे मैं आकर आपत्ति जताऊं? क्या वो बोन फायर तुमने आयोजित किया था ? अगर हां तो आगे आओ फिर तुमसे शिकायत करूं मैं। वर्ना इन सब बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में रहते हुये मैं अपनी हर समस्या,सुख-दुख पूरी तरह अपने चाहने वालों के साथ शेयर करुंगा, जिसे नहीं पसंद वो ना पढ़े, ब्लॉक कर दे मुझे क्योंकि मेरी लेखनी रुकने वाली नहीं है। 

Saturday, 22 November 2014

नारी : प्रेयसी भी और पीड़िता भी


वो बड़ी खूबसूरत थी जब भी उसे देखता था तो दिल अटक ही जाता था। अक्सर दिख ही जाती थी वो कॉलेज आते जाते और जब भी दिखती थी दिल उछल कर बाहर ही आना चाहता था जैसे। बड़ी प्यारी लगती थी वो, और लगना क्या थी ही बड़ी प्यारी। देखते तो उसे हमेशा थे और देखने के बाद लगता था कि सुबह- सुबह जागना और ठंडे पानी से नहाना सफल हो गया।

यूं ही हमारी आशिकी आगे-आगे और पढ़ाई जाने कहां पीछे-पीछे आती ही रही, और महीने बीतते गये, एक दिन देखा उसे तो थोड़ी अपसेट सी लगी लेकिन कभी बात तो हुई नहीं थी इसलिये टोकने की हिम्मत नहीं हुई। काफी कोशिशों के बाद थोड़ा सा पता चला कि किसी लड़के ने शायद कुछ कहा है।

खोजी पत्रकारिता के पहले सोपान को पार करते हुये डिटेल खोदी तो पता चला कि कहा सुनी नहीं है ये तो छेड़छाड़ का मामला था। लड़के ने जानबूझ कर उसे गलत तरीके से छुआ था। ये सुनकर बड़ा गुस्सा आया और सोचा कि सर तोड़ दें साले का।

लेकिन फिर सबने समझाया कि पहले कंप्लेन कर के देख लो। पहली बार उससे इस सिलसिले में बात होगी कभी सोचा नहीं था। मेरे बोलने पर वो तैयार हुई और फिर कॉलेज के वूमेन्स सेल में शिकायत की गई। फिर शुरू हुआ तारीख पर तारीख का सिलसिला।

हर तारीख पर उसे परेशानी के अलावा और कुछ नहीं मिला। ऐसे-ऐसे सवाल किये जाते थे कि लिखना मुश्किल है। फिर एक दिन सुनवाई के दौरान सेल की अध्यक्ष ने उससे केस वापस लेने की सलाह देते हुये कहा कि छेड़छाड़ साबित नहीं हो पायेगी क्योंकि कोई गवाह नहीं है।

इन सब बातों से वो इतनी परेशान हुई कि उसे काउंसलर की मदद लेनी पड़ी। काफी काउंसिलिंग के बाद वो ठीक हुई और फिर कॉलेज वापस आई। लेकिन आने के बाद वो वैसी नहीं रह गई, बिल्कुल डरी-सहमी और अपने में खोई रहने वाली बन गई। ऐसे किसी हादसे के चलते अपनी जिंदगी जीना भूल जाने वाली ये कोई पहली या आखिरी लड़की नहीं है।

बल्कि रोज हजारों लड़कियां ऐसे ही किसी कारण के चलते स्कूल, कॉलेज छोड़ने के लिये मजबूर हो जाती हैं। हर बार अपराधी बच निकलता है, कभी लोक-लोज का भय तो कभी, मामला साबित ना कर पाने डर।


ऐसा नहीं है कि इन बढ़ते अपराधों के पीछे कानून का ढ़ीला होना या फिर कमजोर होना जिम्मेदार है। बल्कि देखने वाली बात तो ये है कि कानून की सख्ती जैसे जैसे बढ़ रही है महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार भी बढ़ रहे हैं। फिर चाहे वो स्कूल कॉलेजों में, सड़कों पर ,कार्यालयों में और यहां तक कि घरों तक में रोज हो रही शारीरिक छेड़छाड़।


आखिर क्या वजह है कि ऐसे मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं और धीरे धीरे समाज उनको स्वीकार भी कर ले रहा है। छेड़छाड़ की शिकायत करने अगर लड़के के घर जाओ तो अक्सर ये बात सुनने में आती है कि लड़का है तो लड़की तो छेड़ेगा ही।

अब सवाल ये है कि ऐसी मानसिकता आखिर क्यों है। क्या इसके लिये समाज का पुरुषवादी होना जिम्मेदार है या फिर महिलाओं को भोग की वस्तु समझने की सोच?
इस पर लंबी बहस हो सकती है। लेकिन सवाल तो ये है कि भारत जहां नदियों को भी मां माना जाता है और नारियों की पूजा की जाती है। वहां ऐसे हालात आखिर क्यों हैं।


हमारा समाज जो कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता का गान करता है, वहां नारियों की इतनी बुरी दशा आखिर क्यों? बिना मां के हम पैदा नहीं हो सकते, बिना बहन के हमारा बचपन अच्छा नहीं बीत सकता, बिना पत्नी जीवन की कल्पना ही बेकार है, और बेटी तो सहारा होती ही है।


इतना सब करने के बाद भी अब नारी और क्या करे कि उसे बस उसकी जिंदगी थोड़ी आसान हो जाये। और उसे वो सब ना झेलना पड़े जो वो अभी झेल रही है।

Sunday, 16 November 2014

सच्चा व्यंग्य

प्यारे साथियों अगर आप मुझे वोट देते हैं तो मैं जीतने के बाद सबसे पहला काम ये करुंगा कि कोई प्यासा ना सोये..। मतलब कि दारू फ्री..। दूसरा काम ये होगा कि लड़कियां छेड़ने का जो काम सिर्फ मेरे चेले करते आ रहे हैं, उस पर से उनका अधिपत्य हटाते हुये 60 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करुंगा जिससे कोई भी नौजवान हीनभावना का शिकार ना हो..। नेताजी बोलते जा रहे थे और जनता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुन रही थी..। नेताजी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुये कहा कि ये जो टूटी सड़कें आप देख रहे हैं उनका भी कायाकल्प जल्द ये जल्द कराते हुयें उन्हें जुतवाकर उनमें खेती कराने का प्रावधान लागू करायेंगे क्योंकि भूखे सोने वाले आदमी को सड़क से ज्य़ादा रोटी की जरूरत होती है..। बिजली की किल्लत से आप लोग बराबर परेशान रहते हैं तो मित्रों आप को इस परेशानी से मुक्ति दिलाने के लिये कृतसंकल्पित आपका ये नेता सबके सामने घोषणा करता है कि अब से बिजली आपसे आंख मिचौली खेलने के लायक ही नहीं रह जायेगी..। मैं अपने क्षेत्रवासियों को बिजली की गुलामी से आजाद करते हुये सारे खंभे और तार नोचकर फिंकवाने का प्रबंध जीतते ही करुंगा..। बिना पानी के ट्यूबवेल का क्या काम सो मैं सारे सरकारी ट्यूबवेल भी बंद कराने का जुगाड़ कर ही लूंगा..। गुंडों और पुलिस की गुंडागर्दी से परेशान लोगों की समस्या का भी निदान है मेरे पास..। मैं सारे पुलिसवालों को भगाकर उनकी जगह गुंडों की भर्ती की भी अनुशंसा करुंगा जिससे पुलिस की गुंडागर्दी तो खत्म होगी ही और जब गुंडे ही पुलिस बन जायेंगे तो उनकी भी गुंडागर्दी खत्म ही समझो..। नेताजी अपने फ्लो में बोलते जा रहे थे और पब्लिक ने धड़ाधड़ तालियां बजाते हुये नेताजी जिंदाबाद के नारे लगा लगा कर माहौल को गुंजायमान बनाये रखा था..। सभा की समाप्ति पर नेताजी ने लोगों से एकबार फिर खुदको जिताने का वचन लेते हुये अपनी एंडेवर और फॉर्च्यूनर गाड़ियों के काफिले को धूल उड़ाने की आज्ञा सुना दी...।

Tuesday, 11 November 2014

दशा बस्ती की

बस्ती की राजनीति तो शुरू से ही पतनोन्मुख रही है लेकिन, पिछले कुछ दिनों से इसमें एक नई गिरावट देखने को मिल रही है..। सांसद, विधायक बारी बारी से धरना प्रदर्शन कर खुद को पाक साफ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं..। समझ नहीं आता इस पर हंसे या रोयें??
सालों से हम बस्ती के लोग ठगे जा रहे हैं..। होश संभाला तो कमंडल का दौर था और राम लहर पर सवार श्रीराम चौहान नामक जीव को सांसद बने सुना, जी बस सुना कभी देखने का अवसर नहीं मिला..। तीन बार लगातार राम लहर पर चढ़े रहे चौहान साहब लेकिन क्षेत्र में कभी दिखे नहीं..। हैं भूवर निरंजनपुर में उनके देखे जाने की अफवाहें जरूर सुनी..। फिर सीट आरक्षित हुई और चढ़ गुंडों की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर के सहारे लालमणी प्रसाद जीत गये.। जीतने से पहले नेताजी बड़े गरीब थे., बाद का तो सबको पता है। फिर सीट हुई सामान्य और भिड़े बड़े-बड़े योद्धा..। पूर्व काबीना मंत्री और हरैया विधानसभा के विधायक राजकिशोर सिंह सपा के टिकट पर, कुर्मी क्षत्रप रामप्रसाद चौधरी ने अपने भतीजे और ठेकेदार अरविंद कुमार को तो कांग्रेस ने मशहूर एनजीओबाज बसंत चौधरी को उतारा।  और बीजेपी ने योगी बाबा के आशिर्वाद युक्त साफ  छवि के एमएलसी डॉ. वाईडी सिंह पर दांव खेला..। इस चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुये चाचा के भतीजे ने अच्छे अंतर से जीत दर्ज की..। पूर्व मंत्री दूसरे तो डॉ. साब तीसरे नंबर पर रहे..। अरे हां लालमणी जी के बारे में भी बताना उचित रहेगा, वो भाग खड़े हुये और बहराइच सुरक्षित सीट पर जाकर रुके लेकिन उनके द्वारा बस्ती में विकास के लिये कराये गये धुंआधार काम ने उन्हें वहां जीतने ना दिया..। फिर हुआ इस बार का चुनाव जिसमें भतीजे की जगह रामप्रसाद खुद कूदे हाथी पर चढ़कर, और काबीना मंत्री ने अपनी जगह भाई और मशहूर गुंडे (जी हां वही जिन्होंने पुरानी बस्ती की मशहूर सर्राफा दुकान को दिन-दहाड़े लुटवा दिया था.) और भी कई केस हैं जनाब पर को उतारा, कांग्रेस ने पुराने घोड़े अंबिका सिंह को और बीजेपी ने 2012 का विधानसभा चुनाव हारे (युवा नेता) हरीश द्विवेदी को उतारा.। विधायकी हारने के बाद हरीश जी ने क्षेत्र में घूम-घूम कर अच्छी हवा बना रखी थी और बाकी काम "अबकी बार मोदी सरकार" ने कर दिया और दूबे जी जीत गये...। 6 महीने बीतने वाले हैं और वो बस दिल्ली मुंबई घूम रहे हैं, टीवी पर साक्षात्कार दे रहे  हैं, प्रीतिभोज का लुत्फ उठा रहे हैं, फीते काट रहे हैं, और धरना दे रहे हैं..। दूबे जी के 6 महीने जोड़कर सन् 1990 से 2014 तक में 20 साल हो गये हैं.। अब सारे सपाई,बसपाई,भाजपाई एक साथ मिलकर आयें और ज्यादा नहीं बस 20 बड़े काम गिना दो जो कि सही में जनकल्याण को हुये हों..। और अगर नहीं गिना सकते तो सोशल मीडिया पर चाटुकारिता की जगह सवाल उठाना शुरू करो..।