Monday, 5 January 2015

क्या सिर्फ यही सच है ?

राज 23-24 साल का एक युवा जिसके लिये सिगरेट का धुंआ ऑक्सीजन से ज्यादा जरूरी है, शराब नसों में बहती है खून की तरह और कानून रहता है ठेंगे पर। अपराधी नहीं है लेकिन फिर भी उसके लिये कानून की वही हैसियत जो आज की मीडिया के लिये एथिक्स की है। मैं उससे मिला तो हमेशा की तरह वो शराब और सिगरेट से लबरेज था। साथ बैठे तो बातचीत शुरू हुई..।

मैं—क्या यार क्यों हमेशा ऐसे ही नशे में डूबे रहते हो
?
राज- नशे में कौन नहीं है ?, नेता पावर के नशे में, पुलिस रिश्वत के नशे में, मीडिया टीआरपी के नशे में।

मैं- अरे यार ये फिलॉसफी ना करो बताओ ना ऐसा क्यों है?
राज- क्या बताऊं? छोटा था तो परिवार को हमेशा डर लगा रहता था कि अगर अच्छे नंबर ना आये तो क्या होगा? टीनएजर हुआ तो अच्छी नौकरी ना मिली तो क्या होगा? गर्लफ्रेंड भी बनी तो उसकी अलग दिक्कतें ये करो ये ना करो।

मैं- अच्छा ? फिर
राज- फिर क्या किसी तरह से 10+2 किया फिर बीए करने की कोशिश की, लेकिन हो नहीं पाया, तो ग्रेटर नोएडा आ गया घर से लड़ाई करके एनीमेटर बनने। वहां कुछ लोगों ने अलग ही सब्जबाग दिखाकर मास कॉम में एडमिशन करा दिया। बड़ी अच्छी फील्ड है बड़ा पैसा और ग्लैमर है ब्लॉ-ब्लॉ 
बोलकर। पहले साल तो खूब मजा आया लेकिन समझ भी आने लगा कि बेटा, हमसे ना हो पायेगा।

मैं- ऐसा क्या? लेकिन क्यों?
राज- यार सीनियर्स को भटकते देखा नौकरी के लिये, जिसे नौकरी मिल गई वो सैलरी के लिये मरा 
जा रहा था, छुट्टियों जैसा कुछ होता ही नहीं मीडिया में, ये भी दिखने लगा।

मैं- हां सही कह रहे हो यार। फिर?
राज- सेकेंड इयर के पेपर्स खत्म हुये तो कोशिश की इंटर्नशिप पाने की, कुछ जगहों से बुरी तरह से भगाया गया बेइज्जत करके, फिर एक दिन एक रीजनल न्यूज चैनल से कॉल आई और इंटर्नशिप लग गई, फिर शुरू हुई असली दिक्कतें। सुबह 11 बजे जाना फिर वापस आते आते 10-11 बज ही जाते थे। धीरे-धीरे इंटर्नशिप खत्म हुई और नौकरी मिल गई, फिर कुछ ही दिनों बाद एक नेशनल चैनल से फोन आया और मैं वहां पंहुच गया..।

मैं--अरे वाह ये तो बहुत अच्छी बात है इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में?
राज- हंसने लगा और बोला - सही कह रहे हो इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में, ये कहते हुये उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। खैर उसने आगे शुरू किया। वहां कुछ ही दिन बीते थे कि मुझे नाइट शिफ्ट में डाल दिया गया और लगभग नौ महीने तक लगातार मैं नाइट शिफ्ट में ही रहा।
इसी बीच थर्ड इयर के पेपर्स और आईआईएमसी का इंट्रेंस और फिर इंटरव्यू भी हो गया। सेलेक्शन तो पक्का था ही क्योंकि मुझे खुदपर भी यकीन था और उन पर भी जिन्होंने मुझे प्रेरित किया था यहां के लिये ट्राई करने के लिये।

और फिर एक दिन ऑफिस में जैसा कि अक्सर होता है बिना गॉडफादर वालों के साथ, सीनियर नें बिना गलती के चिल्लाना और गाली देना शुरू कर दिया और अपनी आदत से मजबूर मैंने भी जवाब के साथ ही नौकरी को भी लात मार दी। और फिर कुछ दिन खाली बैठा, फिर यहां आईआईएमसी में। इतना कहकर राज तो चुप हो गया लेकिन, मैं सोचने लगा।

मीडिया जो खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते नहीं थकता, लोगों की आवाज होने का दंभ भरने वाले ये बड़े-बड़े मीडिया संस्थान सबकी कमियां तो उजागर करते हैं लेकिन जब बात खुद पर आती है तो अजीब सी चुप्पी इख्तियार कर लेते हैं। सैलरी के नाम पर चंद सिक्के पकड़ा देना, काम के घंटों का कुछ पता नहीं, जिसका जैसा जुगाड़ उसको उतनी सहूलियत। छुट्टी मांगो तो लगता है कि जैसे भीख मांग रहे हैं, वीकऑफ मिलेगा या नहीं कुछ पता नहीं। पेड न्यूज और विज्ञापन ही हर बुलेटिन और खबर का भविष्य तय करते हैं।

संपादकों की जगह अब मैनेजरों की भर्ती होती है, चाहे वो एक लाइन भी ना लिख पाये लेकिन उसे विज्ञापन खींचना और टीआरपी लाना आना चाहिये।


दर्शकों की मांग के नाम पर अश्लीलता फैलाने को अपना धर्म समझते हैं ये लोग। सब के काम में कमी निकालने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने वाले इन लोगों को अपने काम में कमी निकालने वाला लोकतंत्र के ही खिलाफ लगने लगता है और वो इसे सीधे सीधे सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दे देते हैं।

हालात ये हैं कि मीडिया पर कुछ अच्छा लिखना चाहो तो गूगल देवता की शरण में जाना पड़ता है। आम आदमी को लगता है कि मीडिया दलाल है, चोर है, पथभ्रष्ट है, और ऐसा लगने की वजह भी है, मीडिया जब चाहे किसी को भी हीरो बना देता है और जिसे चाहे विलेन। उदाहरस्वरूप चाहे वो दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना का मामला हो या फिर हालिया आम चुनावो में नरेंद्र मोदी की विजय। ये सब मीडिया मैनेजमेंट की ही देन है।

एक तरफ मीडिया फर्जी बाबाओं के खिलाफ खबर चलाता है तो वहीं दूसरी तरफ संत गुरमीत राम रहीम जी इंसा और निर्मल बाबा के सत्संग भी। फर्जी डॉक्टरों, दवाइयों के खिलाफ खबर चलेगी और फिर आधे घंटे का किसी फर्जी हकीम, डॉक्टर या स्वास्थ्य वर्धक गोली, पाउडर, वजन घटाओ चाय, बेल्ट और च्यवनप्राश का प्रचार क्या इसके पीछे पैसे के अलावा और कुछ जिम्मेदार हो सकता है ? 

ऐसा नहीं है कि ये हालात किसी एकाएक बने हैं बल्कि अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि कुछ खास लोग जो कि मीडिया में ऊंचे- ऊंचे पदों पर बैठे हैं सब उन्हीं की महत्वाकांक्षाओं का नतीजा है जो पावर और पैसा के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं और विडम्बना तो ये है कि इसमें सुधार की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।

4 comments:

  1. thats the story of the writer itself...

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  2. जाग़ृतिक जी ये ज्यादातर मीडियाकर्मियों की कहानी है तो भला लेखक कैसे उससे अछूता रह सकता है ?

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