Saturday, 24 January 2015

अमेरिका कब तक रहेगा ऐसे ही विनम्र

ऐसा पहली बार हो रहा है जब अपने गणतंत्र दिवस पर हम अमेरिका के राष्ट्रपति की मेजबानी करेंगे। वैसे तो हमने कई बार अंकल सैम की मेजबानी की है लेकिन ये पहली बार है जब उनकी मेजबानी हम अकेले कर रहे हैं। जी हां क्योंकि पहले जितनी भी बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर आये उनकी यात्रा बिना इस्लामाबाद गये पूरी नहीं हुई। लेकिन अब चाहे इसे मोदी का दक्षिण एशिया में बढ़ता प्रभुत्व कहें या फिर अमेरिका की अवसरवादी कूटनीति अबकी बार ओबामा भारत आयेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जायेंगे।
असलियत में इसके पीछे वजह साफ दिख रही है कि अमेरिका को पता है कि अब भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना रुख सख्त,बहुत ही सख्त कर लिया है। तो दिखावे के लिये ही सही उसे भी सख्त होना ही पड़ेगा वर्ना इससे भारत अमेरिका के रिश्तों पर बुरा परिणाम पड़ सकता है। जो कि अमेरिका के लिये कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नुकसानदायक होगा। अमेरिका बिल्कुल भी नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान जैसे खुद से लड़ते देश के लिये वो दक्षिण एशिया की उभरती हुई महाशक्ति भारत से रिश्ते खराब करे। वैसे भी अमेरिका को सिर्फ दिखावा ही करना है और हम उसी में खुश हो जाते हैं। उदाहरणस्वरूप एक तरफ तो अमेरिका हाफिज, दाउद पर इनाम घोषित करके पाकिस्तान को उन्हें शरण देने से मना करने और दिखाई देने पर गिरफ्तार करने की बात करता है जिसे पाकिस्तान कभी मानता ही नहीं। फिर भी अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुये उसे आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक अहम सहयोगी मानता है। और अरबों डॉलर की सहायता देता है।
भूतकाल में भारत अमेरिका के रिश्ते काफी हद तक एकतरफा रहे हैं जिसमें भारत की भूमिका हमेशा से छोटे भाई की रही है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि अमेरिका भारत को लगभग बराबरी का दर्जा देता हुआ दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गणतंत्र दिवस पर आने के लिये भेजे गये आमंत्रण को ओबामा ने एक बार में स्वीकार करने के साथ ही यहां आने में जो गर्मजोशी दिखाई है उसके कई मायने हैं। दक्षिण एशिया में मुख्यत: चीन का दबदबा है जो कि अमेरिका का शर्तिया प्रतिद्वंदी है और अमेरिका को अच्छे से पता है कि सिर्फ भारत ही चीन को यहां टक्कर दे सकता है। और उसके व्यावसायिक तथा कूटनीतिक हितों की रक्षा कर सकता है। वर्ना ये वही अमेरिका है जिसका नेवी बेड़ा 1971 में अरब सागर तक आ गया था। और 11-13 मई 1998 के परमाणु विस्फोटों  के बाद जिसने भारत पर तमाम तरह के प्रतिबंध लादने में जरा भी देर नहीं लगाई थी।
दूसरी तरफ अगर अमेरिका के इस कदम को वैश्विक स्तर पर देखें तो पता चलता है कि अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ भारत के रिश्ते पहले जैसे नहीं हैं। और अमेरिका इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसीलिये ओबामा ना सिर्फ भारत आने के लिये तैयार हुये बल्कि उन्होंने पाकिस्तान ना जाने और ही रक्षा तथा जलवायु समझौते करने के पर भी फोकस किया है। जबकि आमतौर पर ऐसे समझौतों के लिये अमेरिका सामने वाले देश से कम ही रुचि दिखाता है।

यहां पर ये देखना दिलचस्प होगा कि भारत अमेरिका के रिश्तों में ये गर्माहट कब तक बनी रहती है। क्योंकि रूस इतनी आसानी से भारत से अपनी दोस्ती नहीं तोड़ेगा और रूसी राष्ट्पति पुतिन जिस तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों को ठेंगे पर रखते हैं उसे देखते हुये अमेरिका का इतना विनम्र व्यवहार बहुत दिनों तक तो नहीं रह सकता।

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