बस्ती की राजनीति तो शुरू से ही पतनोन्मुख रही है लेकिन, पिछले कुछ दिनों से इसमें एक नई गिरावट देखने को मिल रही है..। सांसद, विधायक बारी बारी से धरना प्रदर्शन कर खुद को पाक साफ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं..। समझ नहीं आता इस पर हंसे या रोयें??
सालों से हम बस्ती के लोग ठगे जा रहे हैं..। होश संभाला तो कमंडल का दौर था और राम लहर पर सवार श्रीराम चौहान नामक जीव को सांसद बने सुना, जी बस सुना कभी देखने का अवसर नहीं मिला..। तीन बार लगातार राम लहर पर चढ़े रहे चौहान साहब लेकिन क्षेत्र में कभी दिखे नहीं..। हैं भूवर निरंजनपुर में उनके देखे जाने की अफवाहें जरूर सुनी..। फिर सीट आरक्षित हुई और चढ़ गुंडों की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर के सहारे लालमणी प्रसाद जीत गये.। जीतने से पहले नेताजी बड़े गरीब थे., बाद का तो सबको पता है। फिर सीट हुई सामान्य और भिड़े बड़े-बड़े योद्धा..। पूर्व काबीना मंत्री और हरैया विधानसभा के विधायक राजकिशोर सिंह सपा के टिकट पर, कुर्मी क्षत्रप रामप्रसाद चौधरी ने अपने भतीजे और ठेकेदार अरविंद कुमार को तो कांग्रेस ने मशहूर एनजीओबाज बसंत चौधरी को उतारा। और बीजेपी ने योगी बाबा के आशिर्वाद युक्त साफ छवि के एमएलसी डॉ. वाईडी सिंह पर दांव खेला..। इस चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुये चाचा के भतीजे ने अच्छे अंतर से जीत दर्ज की..। पूर्व मंत्री दूसरे तो डॉ. साब तीसरे नंबर पर रहे..। अरे हां लालमणी जी के बारे में भी बताना उचित रहेगा, वो भाग खड़े हुये और बहराइच सुरक्षित सीट पर जाकर रुके लेकिन उनके द्वारा बस्ती में विकास के लिये कराये गये धुंआधार काम ने उन्हें वहां जीतने ना दिया..। फिर हुआ इस बार का चुनाव जिसमें भतीजे की जगह रामप्रसाद खुद कूदे हाथी पर चढ़कर, और काबीना मंत्री ने अपनी जगह भाई और मशहूर गुंडे (जी हां वही जिन्होंने पुरानी बस्ती की मशहूर सर्राफा दुकान को दिन-दहाड़े लुटवा दिया था.) और भी कई केस हैं जनाब पर को उतारा, कांग्रेस ने पुराने घोड़े अंबिका सिंह को और बीजेपी ने 2012 का विधानसभा चुनाव हारे (युवा नेता) हरीश द्विवेदी को उतारा.। विधायकी हारने के बाद हरीश जी ने क्षेत्र में घूम-घूम कर अच्छी हवा बना रखी थी और बाकी काम "अबकी बार मोदी सरकार" ने कर दिया और दूबे जी जीत गये...। 6 महीने बीतने वाले हैं और वो बस दिल्ली मुंबई घूम रहे हैं, टीवी पर साक्षात्कार दे रहे हैं, प्रीतिभोज का लुत्फ उठा रहे हैं, फीते काट रहे हैं, और धरना दे रहे हैं..। दूबे जी के 6 महीने जोड़कर सन् 1990 से 2014 तक में 20 साल हो गये हैं.। अब सारे सपाई,बसपाई,भाजपाई एक साथ मिलकर आयें और ज्यादा नहीं बस 20 बड़े काम गिना दो जो कि सही में जनकल्याण को हुये हों..। और अगर नहीं गिना सकते तो सोशल मीडिया पर चाटुकारिता की जगह सवाल उठाना शुरू करो..।
सालों से हम बस्ती के लोग ठगे जा रहे हैं..। होश संभाला तो कमंडल का दौर था और राम लहर पर सवार श्रीराम चौहान नामक जीव को सांसद बने सुना, जी बस सुना कभी देखने का अवसर नहीं मिला..। तीन बार लगातार राम लहर पर चढ़े रहे चौहान साहब लेकिन क्षेत्र में कभी दिखे नहीं..। हैं भूवर निरंजनपुर में उनके देखे जाने की अफवाहें जरूर सुनी..। फिर सीट आरक्षित हुई और चढ़ गुंडों की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर के सहारे लालमणी प्रसाद जीत गये.। जीतने से पहले नेताजी बड़े गरीब थे., बाद का तो सबको पता है। फिर सीट हुई सामान्य और भिड़े बड़े-बड़े योद्धा..। पूर्व काबीना मंत्री और हरैया विधानसभा के विधायक राजकिशोर सिंह सपा के टिकट पर, कुर्मी क्षत्रप रामप्रसाद चौधरी ने अपने भतीजे और ठेकेदार अरविंद कुमार को तो कांग्रेस ने मशहूर एनजीओबाज बसंत चौधरी को उतारा। और बीजेपी ने योगी बाबा के आशिर्वाद युक्त साफ छवि के एमएलसी डॉ. वाईडी सिंह पर दांव खेला..। इस चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुये चाचा के भतीजे ने अच्छे अंतर से जीत दर्ज की..। पूर्व मंत्री दूसरे तो डॉ. साब तीसरे नंबर पर रहे..। अरे हां लालमणी जी के बारे में भी बताना उचित रहेगा, वो भाग खड़े हुये और बहराइच सुरक्षित सीट पर जाकर रुके लेकिन उनके द्वारा बस्ती में विकास के लिये कराये गये धुंआधार काम ने उन्हें वहां जीतने ना दिया..। फिर हुआ इस बार का चुनाव जिसमें भतीजे की जगह रामप्रसाद खुद कूदे हाथी पर चढ़कर, और काबीना मंत्री ने अपनी जगह भाई और मशहूर गुंडे (जी हां वही जिन्होंने पुरानी बस्ती की मशहूर सर्राफा दुकान को दिन-दहाड़े लुटवा दिया था.) और भी कई केस हैं जनाब पर को उतारा, कांग्रेस ने पुराने घोड़े अंबिका सिंह को और बीजेपी ने 2012 का विधानसभा चुनाव हारे (युवा नेता) हरीश द्विवेदी को उतारा.। विधायकी हारने के बाद हरीश जी ने क्षेत्र में घूम-घूम कर अच्छी हवा बना रखी थी और बाकी काम "अबकी बार मोदी सरकार" ने कर दिया और दूबे जी जीत गये...। 6 महीने बीतने वाले हैं और वो बस दिल्ली मुंबई घूम रहे हैं, टीवी पर साक्षात्कार दे रहे हैं, प्रीतिभोज का लुत्फ उठा रहे हैं, फीते काट रहे हैं, और धरना दे रहे हैं..। दूबे जी के 6 महीने जोड़कर सन् 1990 से 2014 तक में 20 साल हो गये हैं.। अब सारे सपाई,बसपाई,भाजपाई एक साथ मिलकर आयें और ज्यादा नहीं बस 20 बड़े काम गिना दो जो कि सही में जनकल्याण को हुये हों..। और अगर नहीं गिना सकते तो सोशल मीडिया पर चाटुकारिता की जगह सवाल उठाना शुरू करो..।
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