16 दिसम्बर 2012 की घटना को काफी वक्त बीत चुका है। इस दौरान यमुना में ना जाने कितना पानी बह गया और दिल्ली में ना जाने कितनी लड़कियों का बलात्कार हुआ, सरकारें आईं और चली गईं। इस दौरान दिल्ली में और देश में भी बहुत कुछ बदला। अगर कुछ नहीं बदला तो वो है महिलाओं के प्रति समाज का रवैया। दिल्ली गैंगरेप से पहले भी हमारे यहां महिलाएं भोग की वस्तु थीं और आज भी हैं। अफसोस तो इस बात का है कि इतनी घटनाओं के बाद भी हम महिलाओं को बुरी नजर से ही देखते हैं। और ऐसे में बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री में मुकेश द्वारा दिया गया बयान कि ताली एक हाथ से नहीं बजती हमारे समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच को साफ दिखाता है। उसी डॉक्यूमेंट्री में मुकेश और अन्य आरोपियों के वकीलों एम एल शर्मा और एपी सिंह का कहना है कि महिलाएं घर की चारदीवारी में ही सुरक्षित हैं। और रात में तो उनका बाहर निकलना गुनाह है। ऐसा गुनाह जिसके बदले उनका रेप भी हो जाये तो उसके लिये वो ही जिम्मेदार हैं। समझ नहीं आता कि कमी कहां है? हमारी शिक्षा प्रणाली में या सामाजिक संरचना में ? क्योंकि शिक्षित और अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों की सोच में ज्यादा अंतर नहीं दिखता। और निंदनीय तो ये भी है कि हमारी सरकार ने उस सोच का फैलाव रोकने के लिये सच दिखाने पर ही रोक लगा दी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में महिलाओं से संबंधित अपराधों की संख्या 309546 दर्ज की गई थी। जिसमें से 33707 मामले बलात्कार के थे। मेट्रो सिटीज में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर सबसे ज्यादा रेप दिल्ली में होते हैं तो वहीं अगर ओवरऑल बात करें तो प्रति एक लाख की जनसंख्या पर सबसे ज्यादा रेप मिजोरम में होते हैं उसके बाद त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, असम का नंबर आता है। बाकी राज्यों के हालात भी बहुत बेहतर नहीं हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि पूरे देश में महिलाओं की स्थिति कितनी खराब है। और सरकारें उस स्थिति को सुधारने की जगह सच को दिखाने पर ही रोक लगा रही हैं। क्या होता अगर उस ड़ॉक्यूमेंट्री का प्रसारण हो जाता ? कम से कम हमारे देश की महिलाओं को तो पता चलता कि वो कहां रह रही हैं? उनके देश के पुरुषों की सोच कैसी है, वो दुर्गा की तो पूजा करते हैं लेकिन सामने दिखने वाली हर लड़की को छेड़ना अपना धर्म समझते हैं। अब वक्त आ गया है कि नेताओं को बता दिया जाय कि महिला सशक्तिकरण पर सिर्फ भाषण देने से काम नहीं चलेगा, धरातल पर प्रयास करने होंगे। और लगे हाथ उन लोगों को भी चेतावनी दे दी जाय जो मुकेश या उसके वकीलों की तरह सोचते हैं। कि अब भी वक्त है सुधर जाओ वर्ना 5 मार्च 2015 की तारीख को नागालैंड में जो हुआ वो बाकी देश में भी हो सकता है।
Friday, 6 March 2015
Friday, 27 February 2015
क्या इसी देश का सपना देखा था "आजाद" ने ??
कायदे (कानून) तोड़ने के
लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और
जो अपने को आज़ाद कहता था,
बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध
दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'भारत माता की जय!' चिल्लाता
था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब
तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के आतंककारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता
बना। पं० जवाहरलाल नेहरू(साभार
विकीपीडिया)
नेहरू कुछ भी कहें लेकिन भारत की स्वतंत्रता में आजाद का योगदान अतुलनीय था। सीमित संसाधनों में उन्होंने देश के लिये जो किया उसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। उसे करने के लिये तो हम सोच भी नहीं सकते क्योंकि नई पीढ़ी को देश से कोई मतलब ही नहीं है। और गांधी नेहरू की जोड़ी को तो देश के आजाद होने या ना होने से भी कोई खास मतलब नहीं था। जहां गांधी एक अच्छी सरकार चाहते थे जिसे कौन चला रहा है उससे उन्हें कोई मतलब नहीं था, तो वहीं नेहरू को सत्ता में हिस्सेदारी से मतलब था।
ऐसे नेताओं
के भरोसे तो हम कभी आजाद हो ही नहीं पाते, वो
तो भला हो आजाद,शहीद-ए-आजम, और बाकी
क्रांतिकारियों का कि उन्होने प्राणों की आहुति देकर हमें आजाद कराया। और बदले में
हमने उन्हें क्या दिया ? आजाद भारत को एक भ्रष्ट,सांप्रदायिक देश बना दिया। वो देश जिसे अपने इतिहास पर ना तो गर्व है और
ना ही उसकी कोई चिंता,वो देश जो मांगी हुई भाषा, संस्कार, संस्कृति और परम्पराओं
के पीछे अंधी दौड़ लगा रहा है। और अपनी परम्पराओं,संस्कारों, भाषाओं और संस्कृति
की बात करने में शर्मिंदगी महसूस करता है। क्योंकि युवाओं के इस देश के नागरिकों
को लगता है कि ये सब दकियानूसी बातें हैं।
इन शहीदों
ने भारत को एक समाजवादी देश बनाने का सपना देखा था जहां हर नागरिक को बराबरी के
अधिकार मिलें। लेकिन यहां तो अमीरों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग कानून है। और
समाजवाद के नाम को बेचकर नेता अपने पारिवारिक आयोजनों पर अरबों रुपये उड़ा रहे
हैं। पहले अंग्रेजी अदालते थीं जहां हिन्दुस्तानियों को न्याय नहीं मिलता था और अब
अपनी अदालतें होने के बाद भी अमीर जैसा चाहते हैं वैसा फैसला आ जाता है। हालांकि
इसमें अदालतों की कोई गलती नहीं है ना ही मैं उन पर सवाल उठा सकता हूं। लेकिन
कानून की छोटी-छोटी कमियों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों, वकीलों के चलते आज हालात ये
हैं कि गरीबों का तो कानून से भरोसा ही उठ गया है। और अमीर उसका जैसा चाहते हैं
वैसा इस्तेमाल करते हैं।
आजादी के 6
दशकों से भी ज्यादा वक्त गुजरने के बाद भी देश के ज्यादातर लोगों को पीने का साफ
पानी उपलब्ध नहीं है, शौचालयों की उपलब्धता तो सभी जानते ही हैं। सड़कें या तो हैं
नहीं और अगर हैं तो पहचानना मुश्किल है कि सड़क में गढ्ढे हैं या गढ्ढों में सड़क।
बहुत से गांवों में आज भी बिजली नहीं है, और जहां है वहां तो कब आती है और कब जाती
है उसका पता ही नहीं चलता। किसानों को फसल उगाने से पहले तो खाद,बीज और पानी के
लिये परेशान होना पड़ता है, और फसल उगाने के बाद उसके उचित दाम पाने के लिए। जहां
महिलाएं आज भी सुरक्षित नहीं हैं और देश के लिए सीमा पर खड़े सैनिकों की जान की तो
कोई कीमत ही नहीं है।
नेताओं का
परम् ध्येय है सिर्फ पैसे कमाना और अपने परिवार और रिश्तेदारों की बढ़ोत्तरी देश
से तो किसी को कोई मतलब ही नहीं है।
ये आजाद के
सपनों का देश नहीं हो सकता, बिल्कुल नहीं हो सकता। लेकिन इसकी इस हालत के
जिम्मेदार भी तो हमीं हैं। एक वो थे जो 24 साल की उम्र में देश पर कुर्बान हो गये
थे और एक हम हैं जिन्हें देश से कोई मतलब ही नहीं। अब वक्त आ गया है कि हमें एकजुट
होकर भारत देश को उन शहीदों के सपनों का देश बनाने के लिये पूरी ताकत से जुटना
होगा। हमारी तरफ से भारत मां के इस सपूत को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आजाद जी को नमन्
Monday, 23 February 2015
सॉरी
सॉरी पापा मैं गलत था, आप हमेशा सही कहते थे, काश मैंने आपकी बात मान ली होती। लेकिन अब क्या हो सकता है? अब तो मैं इतना आगे निकल आया हूं कि वापस लौट नहीं सकता और आगे जाने की अब ना तो हिम्मत है और ना ही हौंसला। चार साल की इस यात्रा में मीडिया ने इतने दर्द दिये हैं जिसकी बात सोचकर अब तो रोना भी नहीं आता, क्योंकि इस पेशे में ज़ज्बातों के लिये कोई जगह नहीं है। और वैसे भी अगर मैं असफलता से डर कर रोने बैठ गया तो मुझे खुदको आपका बेटा कहने का कोई हक नहीं है। मुझे आज भी याद हैं आपके वो संघर्ष भरे दिन जब आप हमारे बेहतर भविष्य के लिये खाने सोने की परवाह किए बिना दिन-रात काम करते थे, इस उम्मीद में कि जल्द ही मैं बड़ा होकर आपका सहारा बनूंगा। लेकिन अफसोस बड़ा होकर आपका सहारा बनने के बजाय मैंने आपको और ज्यादा संघर्ष करने के लिये मजबूर कर दिया। जिस वक्त आपको मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी उस वक्त मैंने सिर्फ अपने लिेये सोचते हुये आपका सहारा बनने के बजाय नीरज का भी भविष्य दांव पर लगाते हुये आपको और ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर कर दिया। सॉरी पापा आप सही कहते थे मैं ना तो अच्छा बेटा हूं और ना ही अच्छा इंसान। रही बात टैलेंटेड होने की तो वो घमंड भी पूरी तरह से चकनाचूर हो गया। जिस लेखनी के दम पर मैं 2 साल से हर किसी को चैलेंज करता आ रहा था, वो इतनी घटिया है इसका अंदाजा भी नहीं था मुझे। सॉरी पापा मैंने आपकी मेहनत के लाखों रुपये ऐसे ही उड़ा दिये। मुझे पता है पापा आप बहुत दिनों से नई कार लेने की सोच रहे हैं लेकिन मेरी पढ़ाई की वजह से आप बस सोच ही पा रहे हैं। सॉरी नीरज मेरी वजह से तुम्हारे बहुत से सपने अधूरे ही रह गये। स़़ॉरी अंकल मैं आपका आदर्श बेटा नहीं बन पाया। सॉरी मम्मी मेरी वजह से आपने पापा से बहुत बार लड़ाई की, लेकिन आपकी उस लड़ाई के बदले में मैं आपको गर्व का एक क्षण भी नहीं दे पाया। सॉरी दोस्त मैं तुम्हारे भरोसे पर बिल्कुल भी खरा नहीं उतर पाया। स़़ॉरी वरुण सर अब मैं आपका फेवरेट स्टूडेंट कहलाने के लायक नहीं रहा।
"सॉरी"
Monday, 9 February 2015
"आप" को देखकर देखता रह गया...
जी हां जनता को कुछ यही लगा था जब
आप राजनीति में आये थे। आपने वादे ही इतने बड़े-बड़े किये थे। वीआईपी कल्चर को
खत्म करेंगे,बिजली,पानी
मुफ्त(सस्ती) करेंगे, भ्रष्टाचार का अंत करेंगे।
अंबानी-अदानी को जेल भेजेंगे और सच्चाई से परिपूर्ण आचरण करेंगे। बातें तो आपने और
भी बहुत सी की थीं लेकिन आपका ज्यादा ध्यान भ्रष्टाचार को मिटाने पर था। या यूं
कहें कि आपकी लड़ाई का आधार ही भ्रष्टाचार मिटाना था। आपकी सभाओं में नारे भी लगते
थे "भ्रष्टाचार का एक ही काल, केजरीवाल,केजरीवाल" पहले आपने कांग्रेस को भ्रष्टाचारी घोषित किया,हमने यकीन भी कर लिया क्योंकि दशकों तक केंद्र में और 15 सालों से दिल्ली में कांग्रेस का ही राज था और घोटाले अपने चरम पर थे।
कॉमनवेल्थ गेम्स,टूजी,कोल ब्लॉक,
जैसे अनगिनत घोटालों का खुलासा हो रहा था। और आपकी अन्ना के साथ
मिलकर शुरू की गई मुहिम के चलते पूरा देश करप्शन के खिलाफ अभूतपूर्व गुस्से में था
जिसको भुनाने के लिये आपने अपना राजनैतिक दल बना लिया जिसका नाम आपने रखा "आम
आदमी पार्टी" । आपके काम और पार्टी के नाम को देखकर बड़ी उम्मीदें जगीं। दबे
कुचले लोगों को लगा कि अब उनके दिन बहुरने वाले हैं क्योंकि उनके हित की राजनीति
करने वाला आ गया है। और भ्रष्टाचारियों को उनके दिन पूरे होते दिखे। दिल्ली में
चुनाव हुये और जनता ने आपको 28 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी
पार्टी के रूप में चुना। आपने कहा कि हम विपक्ष में बैठेंगे क्योंकि हमारे पास
सरकार बनाने के लिये आवश्यक संख्याबल नहीं है। और उससे पहले ही आपने अपने बच्चों
की कसम खाई थी कि ना तो किसी से समर्थन लेंगे और ना ही किसी को समर्थन देंगे।
लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं और आपने पता नहीं किस जनता से पूछकर(क्योंकि
जनता की राय का खुलासा आपने नहीं किया था) कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली। जी
हां उस कांग्रेस के समर्थन से जिसे आप सबसे बड़ी भ्रष्टाचारी पार्टी मानते थे।
चुनावों के दौरान आप बार बार तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ 370
पेज का सबूत लहरा कर सरकार बनते ही उनपर मुकदमा ठोंकने की बात करते
थे। फिर आपने उन्हीं शीला जी की पार्टी के समर्थन से सरकार बनाई और सारे सबूत
लुप्त हो गये। आपने कहा था कि सत्ता में आते ही बिजली कंपनियों का ऑडिट कराकर
भ्रष्टाचारियों को जेल भेजेंगे। आपने सत्ता में आने के बाद ऑडिट का ऑर्डर तो दिया
लेकिन आपके 49 दिवसीय कार्यकाल में वो ऑडिट पूरा नहीं हुआ।
सत्ता में आने से पहले आप भ्रष्टाचारियों को जेल भेज रहे थे सत्ता में आने के बाद
आपने कहा कि जो आपसे रिश्वत मांगे उसका स्टिंग करके हमारे पास लाओ तब हम कार्यवाही
करेंगे। अब आपको कौन समझाये कि जनता को स्टिंग करने की ट्रेनिंग नहीं मिली है। अगर
कुछ गड़बड़ हो जाये तो बेचारी जनता को भ्रष्टाचारी जान से भी मार डालेंगे क्योंकि
अगर वो सरकारी ऑफिसर की जान ले सकते हैं तो जनता का तो वैसे भी कोई माई-बाप नहीं
होता। आपने बिजली पानी के दाम कम किये ये सराहनीय कदम था लेकिन मान्यवर ये स्लैब
बनाकर दाम कम करने की बात तो आपने नहीं की थी। 666 लीटर पानी
मुफ्त और उसके बाद का पानी पहले के रेट से भी ज्यादा रेट पर। बिजली के शुरूआती 200 यूनिट सस्ते, 200-400 उससे महंगे और फिर और महंगे।
अब आप ही बताओं कि 4 लोगों का परिवार 200 यूनिट बिजली और 666 लीटर पानी में कैसे गुजारा कर
सकता है ? और दिल्ली के लगभग 50 % इलाकों
में अगर पानी की लाइन ही नहीं है तो उन्हें इस योजना से क्या लाभ हुआ? जबकि इस योजना की सबसे ज्यादा जरूरत उन्हें ही है। साहब आपने जीतने से
पहले कहा था कि आप और आपके साथी बंगला-गाड़ी नहीं लेंगे। जीतते ही आपने गाड़ियां
भी लीं और वीआईपी नंबर भी। आपके बंगले की कहानी तो सभी को पता है। इस्तीफे के बाद
भी आपने बंगला नहीं खाली किया और लगभग 2.58 लाख रुपये हर महीने किराया चुकाया,
आप खुदको आम आदमी कहते हैं अच्छी बात है। लेकिन श्रीमान, क्या इस देश का आम आदमी इतने रुपये सिर्फ रहने पर खर्च कर सकने की हालत
में हैं ? जी नहीं बल्कि इतने पैसों में एक आम आदमी अपनी
बेटी की शादी निपटा देता है। आपने कहा था कि सत्ता में आते ही हम रोज लोगों की
समस्याएं खुद सुनेंगे। आपने कोशिश भी की लेकिन अपनी आदत से मजबूर आप भागकर सचिवालय
की छत पर पंहुच गये। आपके मंत्री सोमनाथ भारती जी जो कि वकालत करने के साथ ही
पोर्न साइट्स भी चलाते हैं। आधी रात को शहंशाह बनकर रेड मारने निकल लिये और महिलाओं
को सबके सामने पेशाब करने के लिये मजबूर किया, एम्स तक पीछा
करके उनका यूरीन टेस्ट कराया। श्रीमान ये कैसा स्वराज है ? मुख्यमंत्री
रहते हुये आप धरने पर बैठ गये वो भी तब जबकि गणतंत्र दिवस नजदीक था। आपके हिसाब से
देश के गणतंत्र दिवस से ज्यादा जरूरी आपका धरना था जिसके लिये आपने महिला सुरक्षा को मुद्दा बनाया था। आपको पता है
अरविंद जी कि आपके इस धरने को पाकिस्तान के न्यूज चैनेल कैसे दिखा रहे थे ?
वहां लोगों का कहना था कि जो काम हम इतने सालों में नहीं कर पाये वो
अरविंद ने आते ही कर दिया। भारत मे अराजकता का माहौल बना दिया। गणतंत्र दिवस खतरे
में आ गया था। लेकिन कुछ भी हो आपका मीडिया मैनेजमेंट जबरदस्त है। धरने में कब आप
सड़क पर एक रजाई में सो रहे हैं और उसका कौन सा फ्रेम सही रहेगा उसका बेहद शानदार
तरीके से ख्याल रखा था मीडिया ने। जब आपने मंच से खुद को अराजक कहा तो आपको क्या
लगता है कि आप हीरो बन गये ? नहीं अरविंद आप हीरो नहीं
नक्सली बन गये क्योंकि आप और वो दोनों संविधान का अपमान करना अपना हक समझते हैं।
बस फर्क इतना है कि वो कम पढ़े लिखे हैं और हथियारों के दम पर संविधान का मखौल
उड़ाते हैं और आप इंजीनियर और आईआरएस रह चुके हैं तो बोलकर। जब मुख्यमंत्री के तौर
पर आप झंडारोहण करते हैं तो उसे सलामी नहीं देते और जब आपको गणतंत्र दिवस के लिये
आमंत्रित नहीं किया जाता तो आपको बुरा लगता है। जब आपको लगा कि आपने जो वादे किये
थे वो पूरे नहीं कर पायेंगे तो आपने जनलोकपाल बिल का बहाना बनाकर इस्तीफा दे दिया।
जनलोकपाल बिल पारित कराने में इतनी जल्दबाजी किस बात की ? जनलोकपाल
से ना तो लोगों को खाना मिलेगा ना घर और ना ही सस्ती बिजली,पानी।
फिर उसके लिये दिल्ली वासियों के सपनों से मजाक क्यों ? सिर्फ
इसलिये कि आपको मुगालता हो गया था कि आप पीएम बन सकते हैं ? बस
दिया इस्तीफा और निकल पड़े वाराणसी वाया ट्रेन जेब में 500 रुपये
लिये। जमकर प्रचार किया लगभग पौने 4 लाख वोटों से हारे और
फिर विमान से वापस आये जबकि आपके चमत्कारिक 500 रुपये फिर भी
बचे रह गये। आपकी लड़ाई भ्रष्टाचार से थी लेकिन ये
लड़ाई कम से कम मेरी समझ में तो नहीं आई। सिर्फ खुलासे कर के आप क्या साबित करना
चाहते हैं ? और ये जो आप ईमानदारी के प्रमाणपत्र बांटते हैं
उसे पाने का क्या तरीका है? आम आदमी पार्टी की सदस्यता के
साथ फ्री मिलता है ? आपके हिसाब से तो इस ब्रह्मांड में एक
आप ही ईमानदार हैं बाकी सब चोर हैं,भ्रष्ट हैं। आप चाहे जो कहें लेकिन सच तो ये है
कि, अरविंद जी आप सिर्फ नकारात्मक राजनीति करते हैं और कुछ नहीं।
Monday, 26 January 2015
IIMC में महत्वहीन भारतीय गणतंत्र
ये है भारतीय जनसंचार संस्थान(IIMC) जहां कि भारत के साथ ही विश्व के सुदूर कोनों से भी लोग पत्रकारिता पढ़ने आते हैं। और ये तस्वीर है 26-01-2015 सुबह 11:20 बजे की जहां भारत के हर कोने में गणतंत्र दिवस की धूम थी। हर तरफ झंडारोहण हो चुका था और मिष्ठान्न वितरण के बाद लोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठा रहे थे। हम आईआईएमसी में पढ़ने वाले बच्चे जो कि छात्रावास में रहते हैं। रोज की तरह नाश्ते पर इकट्ठा हुये। आमतौर पर मैं नाश्ता नहीं करता महीनों में कहीं एक बार कर लिया तो कर लिया, लेकिन आज मैं सुबह बहुत जल्दी उठ गया था क्योंकि आज गर्व का दिन था, जश्न मनाने का दिन था। नाश्ते पर मेरी बात हुई नीरज से वो बोला कि यार कोई तैयारी नहीं दिख रही अपने यहां। मैंने कहा यार यहां 15 अगस्त को 11 बजे के बाद ध्वजारोहण हुआ था, हो सकता है आज भी वही हो। फिर संस्थान में उपस्थित कर्मचारियों से बात की तो पता चला कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। थोड़ी निराशा हुई और ज्यादा दुख। फिर हमने सोचा कि 11 बजे तक देख लेते हैं फिर करते हैं जो करना है। लेकिन 11:20 तक कुछ नहीं हुआ तो हम निकल पड़े झंडे की तलाश में। हालांकि मेरी जेब में पड़े हुये आखिरी 200 रुपये इस बात की इजाजत तो नहीं दे रहे थे कि हम ऐसा करें, लेकिन हम निकल पड़े ये सोचकर कि ये दिन बार-बार नहीं आता। मैं,नीरज प्रियदर्शी और हमारे अनन्य सहयोगी महापंडित(राहुल सांकृत्यायन) पैदल नजदीकी बाजार कटवरिया सराय पंहुचे पूरा बाजार छान मारा लेकिन एक अदद झंडा नहीं मिला। हमने वहां चाय पी और विचार किया कि आज तो झंडा लेकर ही चलना है। फिर हम वहां से निकले और पंहुचे बेर सराय लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी झंडा नहीं मिला। वहीं पुराने जेएनयू परिसर में स्थित सीआरपीएफ के कैंप में भी हम पंहुच गये झंडे की खोज में लेकिन, उन्होंने कहा कि उनके पास एक ही झंडा था जो कि फहराया जा चुका है। हम बाहर निकले और फिर महापंडित ने कहा कि यार अब ना बस से चलते हैं मुनीरका। हम उनकी बात मानकर बस में बैठे और मुनीरका पंहुचे वहां की गलियों की खाक छानी बहुत खोजने पर एक जगह झंडा मिला उसे लेकर हम वाया ऑटो संस्थान वापस लौटे। यहां कर्मचारियों ने देखा तो कहा कि आ गये गणतंत्र दिवस मनाकर ? हमने कहा कि नहीं तो अभी तो बाकी है यहीं फहरायेंगे तिरंगा। उन्होंने मना कर दिया कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। लेकिन हम जिद पर थे कि आज तो झंडारोहण करके रहेंगे। वैसे भी अब हम तीन ही नहीं थे हमारे अन्य साथी प्रशांत,जितेश,विकास,चंद्रभूषण,अमन,धर्मेंद्र,अमित,इम्तियाज भी थे। हम जोर-शोर से डंडे की खोज में लग गय जिसे झंडे में लगाया जा सके। फाइनली हमारे साथी इम्तियाज को मिल ही गया डंडा। हमने झंडे को डंडे में लगाया और फिर हमने ऊपर चढ़ने के जुगाड़ की सोची क्योंकि चढ़ने के लिये कोई शॉर्टकट तो है नहीं और ऊपर ताला लगा था। हम अंदर घुसे तो हमें एक सीढ़ी मिल गई बस फिर क्या था? सीढ़ी थी तो छोटी लेकिन हमारे देसी स्पाइडरमैन नीरज उसके सहारे ही चढ़ गये और हमने फिर थोड़ा सा ऊपर चढ़कर झंडा पकड़ाया। अभी ये सब चल ही रहा था कि एक महाशय अंदर से दौड़ते हुये निकले और बोले कि परमीशन कहां है ? बिना परमीशन कैसे कर रहे हो ? और भी तमाम सवाल लेेकर वो कूद पड़े। हमारे महापंडित और अन्य साथियों ने उनसे शब्दों में मुकाबला कर उन्हें निरुत्तर कर दिया फिर भी वो माने नहीं और किसी प्रशासनिक अधिकारी को फोन कर हमारी शिकायत कर दी। लेकिन अधिकारी ने मामले में दखल देने से मना करते हुये कहा कि झंडा ही तो फहरा रहे हैं। कौन सा गलत कर रहे हैं करने दो। हालांकि तब तक हम झंडा फहरा चुके थे।
फिर उन्होंने खुद ही चाभी मंगाई और ताला खुलवाया और हम सारे कॉमरेड ऊपर गये।।
ये तो रही आज के झंडारोहण की कहानी
अब बात करते हैं थोड़ी सामाजिक और संवैधानिक गरिमाओं की। हर सरकारी संस्थान में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को ध्वजारोहण का प्रावधान है। लेकिन आईआईएमसी हेडक्वार्टर 15 अगस्त को दिन में 11 बजे के बाद, अमरावती में इस साल हुआ ही नहीं बाकी सालों का पता नहीं। 2 अक्टूबर तो खैर स्वच्छता दिवस में निकल गया और 26 जनवरी को तो हद ही हो गई यहां ना तो कोई समारोह ना कुछ गणतंत्र दिवस बस एक छुट्टी बनकर रह गया। वजह पूछने पर गोल मोल जवाब कि यहां नहीं होता,कुछ वजह है, ये है, वो है जाने क्या क्या। लेकिन असल वजह कोई नहीं बता रहा।
कितनी शर्मनाक बात है कि ना तो कोई प्रशासनिक अधिकारी और ना ही महान रूप से एक्टिव रहने वाला आईआईएमसी एलुम्नाई एसोसिएशन (इम्का) इस दिन संस्थान में झंडारोहण करने के लिये आगे आया। जबकि 4-5 दिसंबर 2014 की रात में यहां कुछ शिक्षकों और कुछ छात्रों के सौजन्य से धूम-धाम से बोनफायर का आयोजन हुआ था जहां क्या-क्या हुआ था सबको पता है। और तो और विरोध करने पर मारने-पीटने तक की धमकियां दी गईं। शिकायत करने पर कोई कार्यवाही नहीं की गई अपितु पीड़ित पक्ष को डांट कर चुप करा दिया गया। 24 जनवरी को वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा करना चाहते थे तो उनको ये कहते हुये मना कर दिया गया कि संस्थान सेक्यूलर है यहां बस राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, और 26 जनवरी ही मनाये जाते है। फिर अब आप ही बताओ कि 26 जनवरी क्यों नहीं मनाई गई ? क्या इससे भी देश की सेक्यूलर इमेज को खतरा है? बंद कक्षाओं में एथिक्स और मोरलिटी के लेक्चर देना बहुत आसान है लेकिन आम जीवन में उनका पालन करना बेहद मुश्किल।। यहां आप वामपंथी कविताओं के पोस्टर लगा सकते हैं किसी अनुमति की जरूरत नहीं।लेकिन तिरंगा फहराने के लिये आपको एक दिन पहले आवेदन देना पड़ेगा। पूरा कैंपस धूम्रपान मुक्त है लेकिन यहां शिक्षक छात्रों को और छात्र शिक्षक को सिगरेट के साथ ही वीड का भी लेन-देन करते हैं। गाजा-सीरिया पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं और अपने देश से किसी को कोई लेना देना ही नहीं। आईआईएमसी हॉस्टल के तो कहने ही क्या ? कहने को तो हॉस्टल में रहने वालों के लिये 32 नियम हैं जिनमें नशाखोरी नहीं करने,10 बजे के बाद बाहर तो दूर किसी और के कमरे में जाने की मनाही लिखी है लेकिन यहां लोग पूरी रात बाहर घूमते रहते हैं। नशाखोरी तो बेहद आम बात है यहां। अब ऐसे में सवाल ये है कि आईआईएमसी में पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार की जाती है या नशाखोर, अराजक, और नक्सली विचारधारा को मानने वाले नौजवानों की फौज ??
Saturday, 24 January 2015
अमेरिका कब तक रहेगा ऐसे ही विनम्र
ऐसा पहली बार हो रहा है जब अपने गणतंत्र दिवस
पर हम अमेरिका के राष्ट्रपति की मेजबानी करेंगे। वैसे तो हमने कई बार अंकल सैम की
मेजबानी की है लेकिन ये पहली बार है जब उनकी मेजबानी हम अकेले कर रहे हैं। जी हां
क्योंकि पहले जितनी भी बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर आये उनकी यात्रा बिना
इस्लामाबाद गये पूरी नहीं हुई। लेकिन अब चाहे इसे मोदी का दक्षिण एशिया में बढ़ता
प्रभुत्व कहें या फिर अमेरिका की अवसरवादी कूटनीति अबकी बार ओबामा भारत आयेंगे
लेकिन पाकिस्तान नहीं जायेंगे।
असलियत में इसके पीछे वजह साफ दिख रही है कि
अमेरिका को पता है कि अब भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना रुख सख्त,बहुत ही
सख्त कर लिया है। तो दिखावे के लिये ही सही उसे भी सख्त होना ही पड़ेगा वर्ना इससे
भारत अमेरिका के रिश्तों पर बुरा परिणाम पड़ सकता है। जो कि अमेरिका के लिये
कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर नुकसानदायक होगा। अमेरिका बिल्कुल भी नहीं
चाहेगा कि पाकिस्तान जैसे खुद से लड़ते देश के लिये वो दक्षिण एशिया की उभरती हुई
महाशक्ति भारत से रिश्ते खराब करे। वैसे भी अमेरिका को सिर्फ दिखावा ही करना है और
हम उसी में खुश हो जाते हैं। उदाहरणस्वरूप एक तरफ तो अमेरिका हाफिज, दाउद पर इनाम
घोषित करके पाकिस्तान को उन्हें शरण देने से मना करने और दिखाई देने पर गिरफ्तार
करने की बात करता है जिसे पाकिस्तान कभी मानता ही नहीं। फिर भी अमेरिका आतंकवाद के
खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुये उसे आतंकवाद के खिलाफ चल
रही लड़ाई में एक अहम सहयोगी मानता है। और अरबों डॉलर की सहायता देता है।
भूतकाल में भारत अमेरिका के रिश्ते काफी हद तक
एकतरफा रहे हैं जिसमें भारत की भूमिका हमेशा से छोटे भाई की रही है। पहली बार ऐसा
हो रहा है कि अमेरिका भारत को लगभग बराबरी का दर्जा देता हुआ दिख रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गणतंत्र दिवस पर आने के लिये भेजे गये आमंत्रण को ओबामा
ने एक बार में स्वीकार करने के साथ ही यहां आने में जो गर्मजोशी दिखाई है उसके कई
मायने हैं। दक्षिण एशिया में मुख्यत: चीन का
दबदबा है जो कि अमेरिका का शर्तिया प्रतिद्वंदी है और अमेरिका को अच्छे से पता है
कि सिर्फ भारत ही चीन को यहां टक्कर दे सकता है। और उसके व्यावसायिक तथा कूटनीतिक
हितों की रक्षा कर सकता है। वर्ना ये वही अमेरिका है जिसका नेवी बेड़ा 1971 में
अरब सागर तक आ गया था। और 11-13 मई 1998 के परमाणु विस्फोटों के बाद जिसने भारत पर तमाम तरह के प्रतिबंध
लादने में जरा भी देर नहीं लगाई थी।
दूसरी तरफ अगर अमेरिका के इस कदम को वैश्विक
स्तर पर देखें तो पता चलता है कि अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ भारत के रिश्ते
पहले जैसे नहीं हैं। और अमेरिका इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।
इसीलिये ओबामा ना सिर्फ भारत आने के लिये तैयार हुये बल्कि उन्होंने पाकिस्तान ना
जाने और ही रक्षा तथा जलवायु समझौते करने के पर भी फोकस किया है। जबकि आमतौर पर
ऐसे समझौतों के लिये अमेरिका सामने वाले देश से कम ही रुचि दिखाता है।
यहां पर ये देखना दिलचस्प होगा कि भारत
अमेरिका के रिश्तों में ये गर्माहट कब तक बनी रहती है। क्योंकि रूस इतनी आसानी से
भारत से अपनी दोस्ती नहीं तोड़ेगा और रूसी राष्ट्पति पुतिन जिस तरह से अमेरिका और
पश्चिमी देशों को ठेंगे पर रखते हैं उसे देखते हुये अमेरिका का इतना विनम्र
व्यवहार बहुत दिनों तक तो नहीं रह सकता।
Monday, 5 January 2015
क्या सिर्फ यही सच है ?
राज 23-24 साल का एक युवा जिसके लिये सिगरेट का धुंआ
ऑक्सीजन से ज्यादा जरूरी है, शराब नसों में बहती है खून की तरह और कानून रहता है
ठेंगे पर। अपराधी नहीं है लेकिन फिर भी उसके लिये कानून की वही हैसियत जो आज की
मीडिया के लिये एथिक्स की है। मैं उससे मिला तो हमेशा की तरह वो शराब और सिगरेट से
लबरेज था। साथ बैठे तो बातचीत शुरू हुई..।
मैं—क्या यार क्यों हमेशा ऐसे ही नशे में डूबे रहते हो?
राज- नशे में कौन नहीं है ?, नेता पावर के नशे में, पुलिस रिश्वत के नशे में, मीडिया टीआरपी के नशे में।
मैं- अरे यार ये फिलॉसफी ना करो बताओ ना ऐसा क्यों है?
राज- क्या बताऊं? छोटा था तो परिवार को हमेशा डर लगा रहता था कि अगर अच्छे नंबर ना आये तो क्या होगा? टीनएजर हुआ तो अच्छी नौकरी ना मिली तो क्या होगा? गर्लफ्रेंड भी बनी तो उसकी अलग दिक्कतें ये करो ये ना करो।
राज- क्या बताऊं? छोटा था तो परिवार को हमेशा डर लगा रहता था कि अगर अच्छे नंबर ना आये तो क्या होगा? टीनएजर हुआ तो अच्छी नौकरी ना मिली तो क्या होगा? गर्लफ्रेंड भी बनी तो उसकी अलग दिक्कतें ये करो ये ना करो।
मैं- अच्छा ? फिर
राज- फिर क्या किसी तरह से 10+2 किया फिर बीए करने की कोशिश की, लेकिन हो
नहीं पाया, तो ग्रेटर नोएडा आ गया घर से लड़ाई करके एनीमेटर बनने। वहां कुछ लोगों
ने अलग ही सब्जबाग दिखाकर मास कॉम में एडमिशन करा दिया। बड़ी अच्छी फील्ड है बड़ा
पैसा और ग्लैमर है ब्लॉ-ब्लॉ
बोलकर। पहले साल तो खूब मजा आया लेकिन समझ भी आने लगा
कि बेटा, हमसे ना
हो पायेगा।
मैं- ऐसा क्या? लेकिन क्यों?
राज- यार सीनियर्स को भटकते देखा नौकरी के लिये, जिसे नौकरी मिल गई वो
सैलरी के लिये मरा
जा रहा था, छुट्टियों जैसा कुछ होता ही नहीं मीडिया में, ये भी
दिखने लगा।
मैं- हां सही कह रहे हो यार। फिर?
राज- सेकेंड इयर के पेपर्स खत्म हुये तो कोशिश की इंटर्नशिप पाने की,
कुछ जगहों से बुरी तरह से भगाया गया बेइज्जत करके, फिर एक दिन एक रीजनल न्यूज चैनल
से कॉल आई और इंटर्नशिप लग गई, फिर शुरू हुई असली दिक्कतें। सुबह 11 बजे जाना फिर
वापस आते आते 10-11 बज ही जाते थे। धीरे-धीरे इंटर्नशिप खत्म हुई और नौकरी मिल गई,
फिर कुछ ही दिनों बाद एक नेशनल चैनल से फोन आया और मैं वहां पंहुच गया..।
मैं--अरे वाह ये तो बहुत अच्छी बात है इतनी जल्दी कौन पंहुचता है
नेशनल चैनल में?
राज- हंसने लगा और बोला - सही कह रहे हो इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में, ये कहते हुये उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। खैर उसने आगे शुरू किया। वहां कुछ ही दिन बीते थे कि मुझे नाइट शिफ्ट में डाल दिया गया और लगभग नौ महीने तक लगातार मैं नाइट शिफ्ट में ही रहा।
राज- हंसने लगा और बोला - सही कह रहे हो इतनी जल्दी कौन पंहुचता है नेशनल चैनल में, ये कहते हुये उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। खैर उसने आगे शुरू किया। वहां कुछ ही दिन बीते थे कि मुझे नाइट शिफ्ट में डाल दिया गया और लगभग नौ महीने तक लगातार मैं नाइट शिफ्ट में ही रहा।
इसी बीच थर्ड इयर के पेपर्स और आईआईएमसी का इंट्रेंस और फिर इंटरव्यू
भी हो गया। सेलेक्शन तो पक्का था ही क्योंकि मुझे खुदपर भी यकीन था और उन पर भी
जिन्होंने मुझे प्रेरित किया था यहां के लिये ट्राई करने के लिये।
और फिर एक दिन
ऑफिस में जैसा कि अक्सर होता है बिना गॉडफादर वालों के साथ, सीनियर नें बिना गलती
के चिल्लाना और गाली देना शुरू कर दिया और अपनी आदत से मजबूर मैंने भी जवाब के साथ
ही नौकरी को भी लात मार दी। और फिर कुछ दिन खाली बैठा, फिर यहां आईआईएमसी में।
इतना कहकर राज तो चुप हो गया लेकिन, मैं सोचने लगा।
मीडिया जो खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते नहीं थकता, लोगों की आवाज होने का
दंभ भरने वाले ये बड़े-बड़े मीडिया संस्थान सबकी कमियां तो उजागर करते हैं लेकिन
जब बात खुद पर आती है तो अजीब सी चुप्पी इख्तियार कर लेते हैं। सैलरी के नाम पर चंद
सिक्के पकड़ा देना, काम के घंटों का कुछ पता नहीं, जिसका जैसा जुगाड़ उसको उतनी
सहूलियत। छुट्टी मांगो तो लगता है कि जैसे भीख मांग रहे हैं, वीकऑफ मिलेगा या नहीं
कुछ पता नहीं। पेड न्यूज और विज्ञापन ही हर बुलेटिन और खबर का भविष्य तय करते हैं।
संपादकों की जगह अब मैनेजरों की भर्ती होती है, चाहे वो एक लाइन भी ना लिख पाये
लेकिन उसे विज्ञापन खींचना और टीआरपी लाना आना चाहिये।
दर्शकों की मांग के नाम पर अश्लीलता फैलाने को अपना धर्म समझते हैं ये
लोग। सब के काम में कमी निकालने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने वाले इन लोगों को
अपने काम में कमी निकालने वाला लोकतंत्र के ही खिलाफ लगने लगता है और वो इसे सीधे
सीधे सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दे देते हैं।
हालात ये हैं कि
मीडिया पर कुछ अच्छा लिखना चाहो तो गूगल देवता की शरण में जाना पड़ता है। आम आदमी
को लगता है कि मीडिया दलाल है, चोर है, पथभ्रष्ट है, और ऐसा लगने की वजह भी है,
मीडिया जब चाहे किसी को भी हीरो बना देता है और जिसे चाहे विलेन। उदाहरस्वरूप चाहे
वो दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना का मामला हो या फिर हालिया आम चुनावो में
नरेंद्र मोदी की विजय। ये सब मीडिया मैनेजमेंट की ही देन है।
एक तरफ मीडिया फर्जी
बाबाओं के खिलाफ खबर चलाता है तो वहीं दूसरी तरफ संत गुरमीत राम रहीम जी इंसा और
निर्मल बाबा के सत्संग भी। फर्जी डॉक्टरों, दवाइयों के खिलाफ खबर चलेगी और फिर आधे
घंटे का किसी फर्जी हकीम, डॉक्टर या स्वास्थ्य वर्धक गोली, पाउडर, वजन घटाओ चाय,
बेल्ट और च्यवनप्राश का प्रचार क्या इसके पीछे पैसे के अलावा और कुछ जिम्मेदार हो
सकता है ?
ऐसा
नहीं है कि ये हालात किसी एकाएक बने हैं बल्कि अगर हम ध्यान दें तो पता चलता है कि
कुछ खास लोग जो कि मीडिया में ऊंचे- ऊंचे पदों पर बैठे हैं सब उन्हीं की
महत्वाकांक्षाओं का नतीजा है जो पावर और पैसा के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार
दिखते हैं और विडम्बना तो ये है कि इसमें सुधार की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।
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