Friday, 6 March 2015

भारत की बेटी

16 दिसम्बर 2012 की घटना को काफी वक्त बीत चुका है। इस दौरान यमुना में ना जाने कितना पानी बह गया और दिल्ली में ना जाने कितनी लड़कियों का बलात्कार हुआ, सरकारें आईं और चली गईं। इस दौरान दिल्ली में और देश में भी बहुत कुछ बदला। अगर कुछ नहीं बदला तो वो है महिलाओं के प्रति समाज का रवैया। दिल्ली गैंगरेप से पहले भी हमारे यहां महिलाएं भोग की वस्तु थीं और आज भी हैं। अफसोस तो इस बात का है कि इतनी घटनाओं के बाद भी हम महिलाओं को बुरी नजर से ही देखते हैं। और ऐसे में बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री में मुकेश द्वारा दिया गया बयान कि ताली एक हाथ से नहीं बजती हमारे समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच को साफ दिखाता है। उसी डॉक्यूमेंट्री में मुकेश और अन्य आरोपियों के वकीलों एम एल शर्मा और एपी सिंह का कहना है कि महिलाएं घर की चारदीवारी में ही सुरक्षित हैं। और रात में तो उनका बाहर निकलना गुनाह है। ऐसा गुनाह जिसके बदले उनका रेप भी हो जाये तो उसके लिये वो ही जिम्मेदार हैं।  समझ नहीं आता कि कमी कहां है? हमारी शिक्षा प्रणाली में या सामाजिक संरचना में ? क्योंकि शिक्षित और अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों की सोच में ज्यादा अंतर नहीं दिखता। और निंदनीय तो ये भी है कि हमारी सरकार ने उस सोच का फैलाव रोकने के लिये सच दिखाने पर ही रोक लगा दी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में महिलाओं से संबंधित अपराधों की संख्या 309546 दर्ज की गई थी। जिसमें से 33707 मामले बलात्कार के थे। मेट्रो सिटीज में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर सबसे ज्यादा रेप दिल्ली में होते हैं तो वहीं अगर ओवरऑल बात करें तो प्रति एक लाख की जनसंख्या पर सबसे ज्यादा रेप मिजोरम में होते हैं उसके बाद त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, असम का नंबर आता है। बाकी राज्यों के हालात भी बहुत बेहतर नहीं हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि पूरे देश में महिलाओं की स्थिति कितनी खराब है। और सरकारें उस स्थिति को सुधारने की जगह सच को दिखाने पर ही रोक लगा रही हैं। क्या होता अगर उस ड़ॉक्यूमेंट्री का प्रसारण हो जाता ? कम से कम हमारे देश की महिलाओं को तो पता चलता कि वो कहां रह रही हैं? उनके देश के पुरुषों की सोच कैसी है, वो दुर्गा की तो पूजा करते हैं लेकिन सामने दिखने वाली हर लड़की को छेड़ना अपना धर्म समझते हैं। अब वक्त आ गया है कि नेताओं को बता दिया जाय कि महिला सशक्तिकरण पर सिर्फ भाषण देने से काम नहीं चलेगा, धरातल पर प्रयास करने होंगे। और लगे हाथ उन लोगों को भी चेतावनी दे दी जाय जो मुकेश या उसके वकीलों की तरह सोचते हैं। कि अब भी वक्त है सुधर जाओ वर्ना 5 मार्च 2015 की तारीख को नागालैंड में जो हुआ वो बाकी देश में भी हो सकता है।

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