Sunday, 4 December 2016

फ्रेजर का कमाल और कमाल का बोर्नमथ!

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दुनिया की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फुटबॉल लीग इंग्लिश प्रीमियर लीग (EPL) सबसे टफ लीग मानी जाती है। सभी का मानना है कि जो कंपटीशन लेवल यहां होता है वह कहीं नहीं होता। इस बात को संडे को बोर्नमथ और लिवरपूल के बीच हुए मैच ने साबित भी कर दिया। मैच के 75वें मिनट तक 3-1 से पीछे चल रही बोर्नमथ ने 5 आखिरी के 17 मिनटों में तीन गोल कर मैच 4-3 से अपने नाम कर लिया। जर्मन मैनेजर यर्गन क्लॉप की लिवरपूल अभी लीग टेबल में तीसरे नंबर पर चल रही है जबकि बोर्नमथ का यह प्रीमियर लीग में पहला साल है।
लिवरपूल का दबदबा 
मैच का पहला हाफ पूरी तरह से लिवरपूल के नाम रहा। सैदियो माने, जॉर्डन हेंडरसन और डिवोग ओरिगी ने मिलकर पहले हाफ में बोर्नमथ को पूरी तरह से झकझोर दिया। इस हाफ में ओरिगी ने एक ओपन चांस भी मिस किया लेकिन फिर भी लिवरपूल ने इस हाफ में दो गोल कर 2-0 की लीड ले ली। मैच का पहला गोल 20वें मिनट में आया जब सैदियो माने ने एमरे चैन के पास को जाल में उलझाया। इस गोल के दो मिनट बाद ही लिवरपूल के इंग्लिश मिडफील्डर जॉर्डन हेंडरसन ने बेल्जियन फॉरवर्ड डिवोक ओरिगी के लिए लगभग हाफलाइन से शानदार थ्रोबॉल दी जिस पर ओरिगी ने गोलकीपर को छकाया और एक मुश्किल एंगल से गोल कर स्कोर 2-0 किया।
ऐसे पलटा मैच 
जहां सेकेंड हाफ में 2-0 की लीड के साथ मैदान पर आई लिवरपूल मैच जीतने को लेकर लगभग निश्चिंत थी। वहीं मैच के 53वें मिनट में सब्सिट्यूट आए रेयान फ्रेजर के दिमाग में कुछ अलग ही प्लान चल रहा था। मैच के 56वें मिनट में फ्रेजर बॉल के साथ लिवरपूल के बॉक्स में थे और विपक्षी मिडफील्डर जेम्स मिलनर ने एक गैरजरूरी चैलेंज कर उन्हें गिरा दिया। इस पर मिली पेनल्टी को कोलम विल्सन ने गोल में बदल स्कोर 2-1 किया और बोर्नमथ के फैन्स को थोड़ी सी उम्मीद दिखाई। हालांकि लिवरपूल ने अभी हार नहीं मानी थी और मैच के 64वें मिनट में माने ने एक जबरदस्त रन के बाद बॉल एमरे चैन की तरफ धकेली जिस पर उन्होंने झन्नाटेदार शॉट जमा स्कोर 3-1 कर दिया।
रेयान फ्रेजर

फैंटास्टिक फ्रेजर
डूब रहे बोर्नमथ के लिए फ्रेजर एक बार फिर संकटमोचक बन के आए और 76वें मिनट में बेनिक अफोबे के पास को खूबसूरत फिनिश के जरिए गोल में बदल स्कोर 3-2 किया। इस गोल के बाद भी फ्रेजर नहीं रुके और दो मिनट बाद ही उन्होंने स्टीवन कुक के लिए शानदार मौका बनाया जिस पर कुक ने गोल दाग स्कोर 3-3 कर दिया। मैच खत्म होने से 12 मिनट पहले आए इस गोल ने बोर्नमथ के घरेलू मैदान डीन कोर्ट का माहौल ही बदल दिया। अब लिवरपूल के प्लेयर्स की बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि वो हार मान चुके हैं। यहां से बोर्नमथ ने मैच पर अपना शिकंजा और मजबूत करना शुरू कर दिया। लगातार अटैक के बीच स्टॉपेज टाइम के रूप में मिले 5 मिनट ने बोर्नमथ को पूरे 3 पॉइंट दिला दिए। 90+3 मिनट में लॉन्ग रेंज से लिए स्टीवन कुक के शॉट को लिवरपूल के जर्मन गोलकीपर लोरिस कौरियस ने चेल्सी से लोन पर बोर्नमथ के लिए खेल रहे डच डिफेंडर नैथन एके के पैरों पर डाल दिया। इस पर लिया गया एके का पहला शॉट तो रुक गया लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने गोल कर ही दिया। इस तरह फुटबॉल के अब तक के कुछ सबसे रोमांचक मैचों में से एक का अंत हुआ।

Saturday, 3 December 2016

चेल्सी का जबरदस्त पलटवार, सिटी हुई चारों खाने चित


पेप गुआर्डियोला की मैनचेस्टर सिटी अपने घरेलू मैदान में चेल्सी को पछाड़कर प्रीमियर लीग टेबल में टॉप पोजिशन पर आने की उम्मीद के साथ इस सीजन के अपने 14वें मैच में उतरी थी। पहले हाफ के दौरान जिस तरीके से सिटी खेल रही थी उससे लगातार 7 मैचों से चला आ रहा चेल्सी की जीत का सिलसिला रुकता सा दिखा भी। लेकिन इटैलियन जीनियस मैनेजर एंटोनियो कोंटे की इस टीम ने सेकेंड हाफ के अपने खेल से दिखा दिया कि इस साल वो लोग अपना पिछला सीजन पूरी तरह से भुलाकर उतरे हैं। पहले हाफ में 1-0 से पिछड़ने के बाद चेल्सी ने सेकेंड हाफ में अपने खेल का लेवल जबरदस्त तरीके से उठाते हुए मैनचेस्टर सिटी को 3-1 से धो दिया।
चलिए देखते हैं इस मैच की प्रमुख बातें-

केहिल की गलतियांः इस मैच में चेल्सी के लिए सबसे खराब बात रही उनके सीनियर डिफेंडर गैरी केहिल का गेम। पहले तो केहिल ने पहला हाफ खत्म होने के कुछ सेकेंड पहले ओन गोल कर सिटी को लीड दिलाई। राइट विंग की तरफ से मैनचेस्टर सिटी के स्पैनिश मिडफील्डर हेसुस नवास के क्रॉस को क्लीयर करने के चक्कर में केहिल अपने ही गोल में मार बैठे। मानो इतने से भी उन्हें संतोष ना हुआ और सेकेंड हाफ के शुरुआती मिनटों में अपने सामने से जाती बॉल को आसानी से विपक्षी स्ट्राइकर सर्जियो अगुएरो को लेने दिया। हालांकि इस बॉल पर अगुएरो के लिए शॉट को उन्होंने स्लाइड करते हुए क्लीयर कर दिया। इनके अलावा भी उन्होंने इस मैच में कई गलतियां कीं।


सिटी की फिनिशिंगः मैनचेस्टर सिटी ने इस मैच में गोल करने के कई आसान मौके गंवाए। मैच के 57वें मिनट में सिटी के बेल्जियन मिडफील्डर केविन डि ब्रुएने एकदम ओपन गोल चूक गए। हेसुस नवास की दी हुई बॉल को उन्हें खाली गोल में उलझाना था लेकिन वह उसे बार पर मार बैठे। उनसे पहले 53वें मिनट में अगुएरो के शॉट को चेल्सी के गोलकीपर कोर्टवा ने बचाया था। इसी तरह 48वें मिनट में डि ब्रुएने ने बेल्जियन नेशनल टीम के अपने साथी कोर्टवा को आसान सी कैच प्रैक्टिस कराई थी। मैच के 61वें मिनट में भी अगुएरो चूके थे जबकि पहले हाफ में भी सिटी ने कई आसान मौके गंवाए।

चेल्सी के काउंटर अटैकः पहले हाफ में पिछड़ने के बाद चेल्सी ने सेकेंड हाफ में जबरदस्त वापसी की। ब्लूज की इस वापसी की अगुवाई एक बार फिर स्पैनिश स्ट्राइकर डिएगो कोस्टा ने की। कोस्टा ने 59वें मिनट में सेस फैब्रेगास की खूबसूरत लॉन्ग बॉल को रिसीव कर सिटी के अर्जेंटीनी डिफेंडर निकलस ओटामैंडी को छकाते हुए जगह बनाई और सिटी के चिलियन गोलकीपर क्लाउडियो ब्रावो बॉल को जाल में जाते देखते ही रह गए। कोस्टा के इस गोल ने चेल्सी में जो जोश भरा वह 69वें मिनट में उनके ब्राजीली मिडफील्डर विलियन ने दोगुना कर दिया। विलियन ने बेहतरीन काउंटर अटैक पर गोल कर स्कोर 2-1 किया। मैच के 89वें मिनट में बराबरी के गोल की तलाश में लगी सिटी की पूरी टीम चेल्सी की डी के आसपास इकट्ठा हो गई। इसी बीच डिफ्लेशन से बॉल चेल्सी के बेल्जियन मिडफील्डर ईडेन हजार्ड के पास पहुंची जिन्होंने बिजली की तेजी दिखाते हुए सिटी के गोल की तरफ दौड़ लगा दी। हजार्ड के इस काउंटर अटैक का सिटी के पास कोई जवाब नहीं था और ब्रावो के कुछ कर पाने से पहले स्कोर 3-1 हो चुका था।
मैन ऑफ द मैच बने कोस्टा

अति अटैक ने डुबोयाः सिटी की टीम इस मैच को जीतने के लिए इतनी उतावली थी कि लगातार अटैक कर रही थी। उनके प्लेयर अटैक करने के चक्कर में अपनी डी छोड़कर चेल्सी की डी में घुसे जा रहे थे। सिटी की इस भारी चूक का चेल्सी ने जमकर फायदा उठाया और काउंटर अटैक कर दो अहम गोल हासिल किए। मौजूदा फुटबॉल जगत के बेस्ट मैनेजर्स में से एक माने जाने वाले पेप गुआर्डियोला की सारी टैक्टिस इस मैच में धरी की धरी रह गई। उनके प्लेयर्स अटैक करने में इतने डूबे रहे कि भूल गए कि फुटबॉल में डिफेंस भी जरूरी होता है।


सिटी ने खोया आपाः मैच के स्टॉपेज (इंजरी) टाइम के दौरान अगुएरो बॉल लेकर आगे बढ़ रहे थे कि तभी चेल्सी के ब्राजीली डिफेंडर डेविड लुईज ने बेहतरीन टैकल के जरिए बॉल उनके कब्जे से निकाल ली। इससे झल्लाए अगुएरो ने लुईज के पैरों पर अपने बूट से इतनी करारी चोट दी जो लुईज का करियर खत्म कर सकती थी। अगुएरो के इस फाउल के बाद पिच का माहौल एकाएक गर्म हो गया। मैच में एक भी गोल ना कर पाए सिटी के प्लेयर चेल्सी के प्लेयर्स पर टूट पड़े। खासतौर से सिटी के ब्राजीली मिडफील्डर फर्नांडीनियो कुछ ज्यादा ही आक्रामक मूड में थे। उन्होंने बीच-बचाव कर रहे चेल्सी के स्पैनिश मिडफील्डर सेस फैब्रेगास को पहले धक्का दिया और फिर उन्हें गले से दबोच लिया। फैब्रेगास ने फर्नांडीनियो के इस व्यवहार पर कोई रिएक्शन ही नहीं दिया। सिटी के प्लेयर्स की इन हरकतों से गुस्साए मिची बत्शुई, विलियन, सेसार एज्प्लिक्वेटा समेत चेल्सी के कुछ खिलाड़ी भी उत्तेजित हो गए। दूसरी तरफ फर्नांडीनियो ने चेल्सी के मैनेजर कोंटे से भी उलझने की कोशिश की, उन्हें किसी तरह से हटाया गया। रेफरी ने अगुएरो और फर्नांडीनियो दोनों को रेड कार्ड दिखा मैच से बाहर किया।

Wednesday, 2 November 2016

हिंदी में फुटबॉल कवर करने वाले महानुभावों, अब बस करो यार!

हिंदी में जब आप स्पोर्ट्स कवर करते हैं तो यहां इसकी अघोषित पहली शर्त यह मानी जाती है कि आपको तेंडुलकर के स्ट्रेट ड्राइव, कोहली के कवर ड्राइव और धोनी के हेलीकॉप्टर शॉट पर ललित निबंध लिखना आना ही चाहिए। मुझे नहीं आते ये ललित निबंध, लेकिन मुझे जो आता है वो अच्छे से आता है। मैं बहुत प्यार से फुटबॉल पर लिखता हूं, किसी दिन कोई गलती चली जाती है तो मैं सो नहीं पाता। मुझे लगता है कि मैंने कैसे, आखिरी कैसे उस गेम के बारे में गलत लिखा जिससे मैं प्यार करता हूं।

हालांकि साल 2013 तक मैं भी फुटबॉल को कोई खास पसंद नहीं करता था। हां एक बात है कि इस गेम के बारे में मैं अपने साथ के फुटबॉल ना पसंद करने वालों से थोड़ा ज्यादा जानता था। इसके पीछे शायद अखबार पढ़ने की मेरी आदत जिम्मेदार थी, जो मीडिया में आने के साथ ही हमेशा के लिए छूट गई। साल 2013 से फुटबॉल में थोड़ी रुचि आई तो अखबारों में खोज-खोजकर फुटबॉल पढ़ता। हिंदी में फुटबॉल की खबरें ना मिलने से काफी निराशा होती। इससे उबरने के लिए मैंने दुनिया की सबसे बोरिंग भाषा अंग्रेजी में छपने वाला द टाइम्स ऑफ इंडिया पढ़ना शुरू किया। मैं TOI सिर्फ दो कारणों से खरीदता था, पहला तो यह कि वो फुटबॉल को सही तरीके से कवर करते हैं और दूसरा कारण यह था कि उसमें पेज बहुत सारे होते हैं जो कई तरीके से यूजफुल हो सकते हैं।

पहली नौकरी टीवी मीडिया में की तो देखा कि टीवी पर वर्ल्ड कप के दौरान आधे घंटे का स्पेशल प्रोग्राम जा रहा है। अच्छा लगा कि चलो चार साल में एक बार ही सही कवर तो कर रहे हैं। फिर देखा कि प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स को कोई इंट्रेस्ट नहीं है बस भेड़चाल के चलते बना दिया जा रहा है। कई बार भयानक ब्लंडर भी चल जाते थे क्योंकि किसी को पता ही नहीं होता था कि ये गलत है या सही। फिर वेब मीडिया में गया तो स्पेस का झंझट खत्म हुआ और मैंने फुटबॉल कवर करना शुरू किया। हालांकि कम ही लोग पढ़ते थे लेकिन मैं थोड़ा ज्यादा वक्त देकर फुटबॉल की खबरों को अलग से बनाता था। कई खबरें तो ऐसी भी रही जो इंडियन इंग्लिश मीडिया से भी पहले मैंने ब्रेक की। जैसे 2015 में मिरास्लोव क्लोस ने कहा था कि लाजियो के साथ आने वाला सीजन उनका प्रफेशनल फुटबॉलर के तौर पर आखिरी सीजन होगा। इसी वक्त बार्सिलोना के ब्राजीलियन राइट बैक दानी अलावेस ने तमाम चर्चाओं के बाद बार्सिलोना के साथ अपना कॉन्ट्रैक्ट एक साल के लिए आगे बढ़ाया था। ऐसी कई खबरें थीं जो अपने पुराने संस्थान के साथ इंडिया में सबसे पहले मैंने ब्रेक की। इसके जरिए मैं ये नहीं कह रहा कि मेरे सोर्स इतने बड़े हैं, मैं डेस्क जॉब करता था। लेकिन मैं तमाम कामों के बीच भी इंटरनैशनल मीडिया के जरिए इंटरनैशनल फुटबॉल में क्या चल रहा है इससे वाकिफ रहता था।


मेसुत ओज़िल

वहां तो खैर फुटबॉल की कवरेज मैंने की, जब तक मुझे जर्नलिस्टिक कामों से इतर के कामों में नहीं लगा दिया गया। फिर वहां से नौकरी छोड़कर मैं प्रिंट मीडिया में आया। प्रिंट में मेरी एंट्री सही वक्त पर हुई थी। यूरो 2016 चल रहा था आधे से ज्यादा पेज फुटबॉल की खबरों से भरा होता था। मेरे लिए तो ये ड्रीम जॉब थी। फिर यूरो खत्म हुआ और यहां से मुझे समझ आने लगा कि फुटबॉल हमेशा कवर क्यों नहीं की जा सकती। दरअसल प्रिंट की अपनी समस्याएं हैं, पेज सीमित होता है। क्रिकेट को ज्यादा जगह देनी ही है क्योंकि लोग वही पढ़ते हैं (ऐसा माना जाता है) । ले देकर 3-4 कॉलम मिल जाते हैं उसी में मैं अपना शौक पूरा कर लेता हूं। कई बार मुझे समझाया भी जा चुका है कि मैं खुद को फुटबॉल जर्नलिस्ट ना समझूं क्योंकि मुझे सब करना है। लेकिन मैं लोगों को कैसे समझाऊं कि मुझे कुछ समझने की जरूरत ही नहीं है। मैं फुटबॉल जर्नलिस्ट ही हूं। जैसे लोग मजबूरी में फुटबॉल पर लिख लेते हैं वैसी ही मजबूरी में मैं क्रिकेट पर भले ही लिख लेता हूं लेकिन मैं फुटबॉल जर्नलिस्ट ही हूं। वैसे भी इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कवर कर रहा हूं। फर्क इस चीज से पड़ता है कि मैं उसे कितनी ईमानदारी से कर रहा हूं।

हिंदी मीडिया में फुटबॉल पढ़ने वालों को बेहतर पता होगा कि क्या को क्या लिखा जा रहा है। ये बहुत ही शर्मनाक स्थिति है लेकिन मजेदार बात यह है कि इस पर किसी को शर्म ही नहीं आ रही। अपना मजाक उड़ाए जाने पर भी लोग कूल हैं। उन्हें लगता है कि कपिल देव की 175 रन की इनिंग्स उन्हें याद है और यही बहुत है। बॉस, अब हो गया वो वाले दिन गए। माना क्रिकेट के चाहने वाले इस देश में बहुत हैं लेकिन सरजी बाकी गेम्स को इग्नोर करना तो बंद ही कर दो। मैं ये नहीं कहता कि आप फुटबॉल कवर ही करो। मत करो यार, कोई जबरदस्ती थोड़े ना है। लेकिन करो तो तरीके से करो। बास्टियन श्वांसटाइगर और एना इवानोविच की शादी की खबर के साथ मेसुत ओज़िल और उसकी गर्लफ्रेंड की फोटो मत लगाओ। रोनाल्डो द्वारा बार्सिलोना के लिए पांच गोल मत कराओ, मैनचेस्टर यूनाइटेड को प्रीमियर लीग के क्वॉर्टर फाइनल में मत पहुंचाओ। पेप गॉर्डियोला के पांच नाम मत लिखो। फुटबॉलर्स की गर्लफ्रेंड्स की हॉट फोटोज की गैलरी मत बनाओ। जो नहीं हो सकता मत करो सर, प्लीज। खुद को सर्वज्ञानी समझना छोड़ दो। सबको पता है कौन प्लेयर कहां, किस पोजिशन पर खेलता है। गोल करने वाला हर प्लेयर स्ट्राइकर नहीं होता ना ही हर अटैकर को आप स्ट्राइकर लिख सकते हैं। विंगर, विंगर ही रहेगा वो स्ट्राइकर नहीं हो सकता भले ही वो साक्षात रोनाल्डो ही क्यों ना हो। माफ कर दो सर, आपसे ना हो पाएगा। आप छोड़ दो, हम मैनेज कर लेंगे। मारका, मिरर, स्काईस्पोर्ट्स इंडिया में भी खुल जाते हैं। हम वहीं पढ़ लेंगे सर, आप प्लीज हिंदी में फुटबॉल कवर कर हम पर एहसान मत करो।

Tuesday, 23 February 2016

UEFA चैंपियंस लीग: बार्सिलोना ने आर्सेनल को 2-0 से हराया, चेक के खिलाफ मेसी ने खोला खाता

बार्सिलोना की जीत के हीरो रहे मेसी

एमिरेट्स स्टेडियम में खेले गए चैंपियंस लीग अंतिम-16 के पहले लेग में बार्सिलोना ने आर्सेनल को 2-0 से हरा दिया. मैच के हीरो रहे स्टार फॉरवर्ड लियोनेल मेसी.
अपने घर में खेल रहे गनर्स ने मैच की शुरुआत जबरदस्त तरीके से की थी. आर्सेनल के फॉरवर्ड्स ने मैच की शुरुआत में बार्का के गोल पर दो-तीन अच्छे हमले किए. लेकिन बार्का के जेरार्ड पिके और जेवियर मस्करान्हो ने जबरदस्त डिफेंडिंग स्किल्स दिखाते हुए गनर्स को गोल नहीं करने दिया.
बार्सिलोना के युवा जर्मन गोलकीपर टेर स्टेगन ने भी अपने डिफेंडरों का साथ देते हुए अच्छे बचाव किए. पहले हाफ में आर्सेन वेंजर की टीम कुछ अच्छे हमलों के बावजूद स्कोर करने में कामयाब नहीं रहे. बार्सिलोना द्वारा ज्यादा टाइम तक गेंद को अपने कब्जे में रखने के बावजूद पहला हाफ 0-0 से बराबरी पर रहा.
दूसरे हाफ में बार्सिलोना की टीम ने अपना खेल जबरदस्त तरीके से बेहतर किया. उन्हें इसका फायदा भी मिला. मैच के 71वें मिनट में मिडफील्डर रैकिटिच ने लेफ्ट विंग पर नेमार को गेंद दी जिन्होंने आर्सेनल के डिफेंस के तितर-बितर होने का फायदा उठाते हुए गेंद के साथ लंबी दौड़ लगा दी.
नेमार के पीछे भागते आर्सेनल के डिफेंडरों ने मेसी को अनदेखा कर दिया. जिन्होंने राइट विंग से तेजी से आगे बढ़ते हुए सेंटर में आकर नेमार के खूबसूरत पास को थामा और अचकचाए चेक के ऊपर से गोल दाग दिया.
इस गोल के बाद दोनों टीमों ने लगातार एक-दूसरे के गोल पर हमले किए. मैच में बराबरी पाने के लिए लगातार कड़ी मेहनत कर रहे आर्सेनल की उम्मीदों पर 81वें मिनट में अंदर आए उनके ही मिडफील्डर मैथ्यू फ्लैमिनी ने पानी फेर दिया.
मैच के 83वें मिनट में मरटेसैकर के कमजोर पास को क्लीयर करने की कोशिश में फ्लैमिनी ने पेनाल्टी बॉक्स के अंदर मेसी पर फाउल कर दिया. मेसी ने फ्लैमिनी की इस भयानक गलती का पूरा फायदा उठाते हुए स्पॉटकिक को गोल के बॉटम लेफ्ट कॉर्नर से भीतर भेजते हुए अपनी टीम की बढ़त को 2-0 कर दिया.
अंत तक आर्सेनल बार्का के डिफेंस को भेदने में नाकाम रही और बार्सिलोना ने पहले लेग को 2-0 से अपने नाम कर लिया. मैच में बार्सिलोना का दबदबा पजेशन से लेकर शॉट्स तक में साफ दिखा.
फोटोज: फेसबुक से

बार्का ने जहां इस मैच में 66 फीसदी पजेशन के साथ ही 15 शॉट्स भी लिए वहीं गनर्स 34 फीसदी पजेशन और आठ शॉट ही ले पाए. मैच में दो गोल करने वाले लियोनेल मेसी ने इसी के साथ गोलकीपर पीटर चेक के खिलाफ गोल ना करने का अपना पिछला हिसाब भी चुकता कर लिया.

Wednesday, 7 October 2015

इतिहास से साथ ही वर्तमान के भी दर्द बयान करती 'गांधी का चंपारण'

इसी भूमि ने गांधी को बनाया 'बापू'
बापू ने वहां निलहा अंग्रेजों द्वारा भारतीय किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई थी. सही मायनों में अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ बापू के आंदोलन की शुरुआत चंपारण से ही हुई थी. बापू को चंपारण बुलाने में सबसे बड़ा योगदान इलाके के किसान राजकुमार शुक्ला का माना जाता है. इन्हीं के बुलाने पर बापू यहां आए थे और वो राजकुमार शुक्ला ही थे जिन्होंने सबसे पहले महात्मा गांधी को बापू कहकर पुकारा था.

यहीं से शुरू हुए थे बापू के प्रयोग
बापू ने चंपारण में काफी दिन गुजारे थे और उन्होंने यहां शिक्षा से लेकर छुआछूत, सामाजिक भेद-भाव मिटाने समेत अपने तमाम प्रयोग किए थे. बापू का यहां आना अंग्रेजों को बिल्कुल नहीं सुहाया, उन्होंने बापू को यहां से वापस भेजने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए. लेकिन जब वो अपने तमाम हथकंडों से भी बापू को वापस ना भेज पाए तब उन्होंने निलहा अंग्रेजों के साथ मिलकर एक खौफनाक चाल सोची. उन्होंने बापू और डॉ राजेंद्र प्रसाद को खाने पर बुलाया. इनके साथ ही चंपारण के अजगरी गांव के रहने वाले बतख मियां, जो कि पेशे से बावर्ची थे भी आए. वहां पहुंचने पर जब अंग्रेजों ने बापू और डॉ राजेंद्र प्रसाद के लिए दूध का गिलास मंगवाया तो बतख मियां को दूध का रंग देखकर शक हुआ और उन्होंने चालाकी दिखाते हुए दूध गिरा दिया. गिरे दूध को अंग्रेज साहब के कुत्ते ने पी लिया और फिर मिनटों में ही जहर ने अपना रंग दिखाया. कुत्ता वहीं पर तड़प-तड़प कर मर गया.

किंवदंतियों में जिंदा हैं बतख मियां
हालांकि ये किस्सा इतिहास की किताबों में अपनी जगह नहीं बना पाया और बतख मियां इतिहास के किस्सों में कहीं गुम हो गए. लेकिन आज भी अजगरी गांव के लोगों के साथ ही डॉ राजेंद्र प्रसाद के करीबी भी बतख मियां का नाम लेते हैं और उनकी कहानियां सुनाते हैं. बापू के अथक प्रयासों से चंपारण के किसान अंग्रेजों के अत्याचारी रवैये से तो बच गए लेकिन आजादी के बाद की सरकारों ने चंपारण के किसानों को अंग्रेजी दौर से भी बुरे हाल में पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

विकास की रेस में पिछड़ता गया चंपारण
बापू के प्रयोगों की पहली प्रयोगशाला बने चंपारण का आजादी के लगभग सात दशक बीतने के बाद भी विकास तो दूर भौतिक सुख-सुविधाओं से भी महरूम होना हमें कहीं ना कहीं सोचने पर मजबूर करता है कि हमने बापू के सपनों को उनकी तस्वीरों के साथ ही कैद कर दिया है. बापू की 146वीं जयंती पर बापू के चंपारण दौरे के हर महत्वपूर्ण पड़ाव के साथ ही चंपारण की मौजूदा स्थिति तक का बेहतरीन चित्रण करती एक डॉक्यूमेंट्री आई है 'गांधी का चंपारण'.

इतिहास के साथ ही वर्तमान भी बताती 'गांधी का चंपारण'
इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से निर्देशक विश्वजीत मुखर्जी और उनकी टीम के शरद पारधे और देवेंद्र सैनी ने बापू के अधूरे सपनों और धूल खाते उनके स्मारकों का बखूबी चित्रण किया है. इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हमें पता चलता है कि बापू के स्थापित पहले विद्यालय के बच्चे ही नहीं जानते कि महात्मा गांधी कौन थे? हालांकि उन्हें ये जरूर पता है कि नरेंद्र मोदी 'सरकार' हैं. उन गांवों का किसान आज भी अन्य किसानों की तरह महंगे डीजल, खाद-बीजों के साथ ही टूटी सड़कों कभी-कभी दर्शन देने वाली बिजली के अलावा सरकारी कर्मचारियों की घूसखोरी से भी परेशान है.

बापू को भूलती उनकी कर्मभूमि की युवा पीढ़ी
डॉक्यूमेंट्री हमें बताती है कि जहां गांधी जी ने किसानों की समस्याएं सुनी थीं वो घर आज खंडहर में तब्दील हो चुका है और कोई उसका पुरसहाल लेने वाला नहीं है. वो ऐतिहासिक मेज जिस पर गांधी जी और निलहा अंग्रेजों (नील मिल मालिकों) के बीच बैठक हुई थी उसपर आज राजनैतिक दल अपना हित साधने के लिए जमा होते हैं. गांधी जी के विभिन्न प्रवास स्थलों पर बने उनके स्मारकों का कोई हाल लेने वाला नहीं है. जिन स्थलों को पर्यटकों से भरा होना चाहिए वहां बिजली, पीने का पानी जैसी बुनियादी समस्याओं के साथ ही अपनी बाउंड्रीवॉल तक नहीं है.

ऐतिहासिक स्मारकों का बुरा हाल
बेतिया की ऐतिहासिक हजारीमल धर्मशाला जहां गांधी जी ठहरे थे आज वहां सांप बिच्छू रहते हैं और बाजार के बीचों-बीच होने के चलते कारोबारी उस पर नजर गड़ाए हैं, वो उस ऐतिहासिक धर्मशाला को तोड़कर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाना चाहते हैं. नरकटियागंज के भितिहरवा आश्रम, जिसकी स्थापना गांधीजी ने अपने हाथों से की थी उसका हाल लेने वाला भी कोई नहीं है. कुल-मिलाकर अगर आप मोहनदास करमचंद गांधी को बापू बनाने वाली घटनाओं को फिर से जीने के साथ ही उस जगह का मौजूदा हाल देखना चाहते हैं तो 'गांधी का चंपारण' जरूर देखें.

Tuesday, 19 May 2015

मैजिकल मेसी की बदौलत बार्सिलोना बना ला-लीगा चैंपियन



स्पेनिश फुटबॉल लीग जिसे ला-लीगा के नाम से जाना जाता है के 2014-15 सीजन के अपने 37वें मैच में मौजूदा विजेता एटलेटिको मैड्रिड को 1-0 से हराकर बार्सिलोना ने एक मैच शेष रहते ही सीजन का खिताब अपने नाम कर लिया। मजे की बात ये है कि पिछले साल एटलेटिको ने बार्सिलोना को उसके घरेलू मैदान पर हराकर खिताब जीता था तो वहीं इस साल बार्सिलोना ने एटलेटिको को उसी के घर में मात देकर खिताब भी जीत लिया और अपना बदला भी पूरा कर लिया। यह बार्सिलोना का कुल 23वां तथा पिछले 7 सालों में 5वां ला-लीगा खिताब है। बार्सिलोना के ला-लीगा चैंपियन बनने में बड़ा योगदान MSN यानि कि मेसी, सुआरेज़ और नेमार का रहा जिन्होंने इस साल ला-लीगा में बार्सिलोना द्वारा किये गये 108गोलों में से 79 गोल अपने नाम किये। इस प्रदर्शन के दम पर इन्होंने बार्सिलोना के लिये 2008-09 सीजन में मेसी,थिएरे हेनरी और सैमुएल एटो के एक सत्र में सर्वाधिक गोलों के रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। जबकि इस साल के सभी कंपटीशनों को मिला दिया जाये तो MSN के गोलों की संख्या 115 पहुंच जाती है जो कि बार्सिलोना के लिये एक साल में सर्वश्रेष्ठ है। इस पूरे सीजन में बार्सिलोना का प्रदर्शन काबिलेतारीफ रहा और उन्होंने अटैक, डिफेंस और मिडफील्ड हर तरफ अपने प्रदर्शन से लोगों को अभीभूत कर दिया। यह जीत इसलिये भी खास है क्योंकि सालों से बार्का मिडफील्ड की जान बने रहे ज़ावी और इनिएस्ता इस साल सिर्फ चार बार एक साथ किसी मैच की शुरुआती एकादश में जगह बना पाये। मैनेजर लुईस एनरीके ने शुरुआती टीम में इनकी जगह पर सर्जियो बस्केट और इवान रैकिटिच को मौका दिया और इन्होंने इस मौके को भुनाते हुये पूरे सीजन में जबरदस्त खेल दिखाया, खासतौर से रैकिटिच ने तो अपने खेल से इनकी कमी महसूस नहीं होने दी। अगर डिफेंस की बात करें तो जहां जेवियर मस्करानो और जेरेमी मैथिऊ के अलावा गेरार्ड पिके ने भी जबरदस्त खेल दिखाया जबकि थॉमस वरमलीन का पूरा सीजन चोटिल रहते ही बीत गया(हालांकि सीजन के आखिरी मैच में उनके खेलने की संभावना है)। वहीं जॉर्डी अल्बा और दानी अलावेस ने लेफ्ट बैक और राइट बैक पोजीशन पर अपनी स्पीड और एबिलिटी से टीम को गतिमान रखने में मदद की। बात अगर गोलकीपिंग की करें तो चिली के क्लाउडियो ब्रावो ने ला-लीगा के 37 मैचों में 23 क्लीन शीट अर्जित कीं। ब्रावो ने इन मैचों में सिर्फ 19 गोल खाये और 74 गोल्स बचाये। बार्सिलोना ने इस सीजन के 37 मैचों में 11 बार विपक्षी टीम को पांच या उससे ज्यादा गोलों से मात दी। बार्सिलोना के 12 खिलाड़ियों नेमार, क्लाउडियो ब्रावो, लुईस सुआरेज़, जेरेमी मैथिऊ, इवान रैकिटिच, रफिन्हा, डगलस, टेर स्टेगन, मुनीर अल हदादी, सान्ड्रो, मैसिप और थॉमस वरमलीन के लिये बार्सिलोना के साथ यह पहला ला-लीगा खिताब है।

एक मैच शेष रहते बार्सिलोना द्वारा 93 अंकों के साथ खिताब जीतने के बाद बार्का तथा उससे चार अंक पीछे रियाल मैड्रिड चैंपियंस लीग के लिये क्वालीफाई कर गये हैं। जबकि 77 अंकों के साथ तीसरे स्थान वाली एटलेटिको मैड्रिड तथा 74 अंकों के साथ चौथे स्थान पर मौजूद वेलेंसिया में से कौन सीधे क्वालीफाई करेगा तथा किसे क्वालीफायर्स से गुजरना पड़ेगा इसका फैसला दोनों टीमों के आखिरी मैच के नतीजों से होगा। जबकि अगर वैलेंसिया अपना आखिरी मैच हार जाती है और पांचवे स्थान पर मौजूद सैविला अपना आखिरी मैच जीत लेती है तो सैविला चैंपियंस लीग के क्वालीफायर मुकाबले खेलने के लिये क्वालीफाई कर जायेगी जबकि वैलेंसिया को विल्लार्रियल के साथ यूरोपा लीग में खेलना पड़ेगा।

Monday, 4 May 2015

कहानी लीजेंड मोहम्मद सलीम की

दोस्तों आज की हमारी कहानी है एक ऐसे खिलाड़ी की जो सन् 1904 में कोलकाता के मेटियाबुरुज नाम की एक छोटी सी जगह के एक बहुत ही गरीब खानदान में पैदा हुआ था। वहां से निकल कर उसने अपने खेल के दम पर स्कॉटलैंड तक का सफर तय किया। और दुनिया उसे आज यूरोप मे खेलने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी के रूप में जानती है।
1920-30 का दौर था भारत के लोग अंग्रेजों को देश से भगाने के लिये हर कोशिश कर रहे थे। उसी दौर में देश के कुछ इलाकों, खासकर बंगाल के लोगों ने फुटबॉल को अंग्रेजों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। वो नंगे पैर फुटबॉल खेलते थे और बूट पहनकर खेलने वाले अंग्रेजों को हराकर उन्हें ये एहसास दिलाते थे कि भारतीय लोग राज करना जानते हैं। क्योंकि अंग्रेजों का कहना था कि अभी भारत के लोग इतने काबिल नहीं हुये हैं कि राज कर सकें।
उस दौर में मोहम्मद सलीम भारत के सबसे बेहतरीन युवा फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में उभरे। उनके खेल को देखते हुये उन्हें बाऊबाजार के मशहूर चितरंजन क्लब ने अपने साथ जोड़ लिया। इनके साथ खेलते हुये सलीम ने शानदार खेल दिखाया जिसके चलते मोहम्मडन की बी टीम ने उन्हें अपने साथ जोड़ने में जरा भी देर नहीं लगाई।
लेकिन यहां करियर को कोई खास फायदा ना होते देखकर सलीम ने उस वक्त के बंगाल के मशहूर खेल एडमिनिस्ट्रेटर पंकज गुप्ता के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुये उनकी टीम स्पोर्टिंग यूनियन को ज्वाइन कर लिया। जहां से ईस्ट बंगाल और आर्यन्स क्लब होते हुये वो 1934 में मोहम्मडन स्पोर्टिंग की सीनियर टीम में आये और फिर शुरू हुआ सलीम के खेल का सबसे बेहतरीन वक्त।
देश के सबसे पुराने फुटबॉल क्लबों में से एक मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब नाम के लिये सलीम फॉरवर्ड और मिडफील्ड दोनों पोजीशन पर खेलते थे(बिल्कुल रोनाल्डो और मेसी की तरह)। सलीम के खेल के दम पर मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने 1934 से लेकर 1938 तक लगातार 5 बार कलकत्ता फुटबॉल लीग का खिताब अपने नाम किया।
1936 की खिताबी जीत में सलीम के योगदान को देखते हुये उन्हें भारत में आयोजित पहले अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मैच में खेलने के लिये आमंत्रित किया गया। जिसमें भारत की दो टीमें- ऑल इंडिया इलेवन और मिलिट्री तथा सिविलियन्स को मिलाकर बनी टीम को चीन की ओलम्पिक टीम के साथ दो मैच खेलने थे।
पहले मैच में सलीम के खेल को देखकर चीनी अधिकारियों ने उनकी खूब प्रशंसा की। उनके खेल को देखते हुये सेना और पुलिस ने उन्हें अपनी टीम में शामिल करने की कोशिश की लेकिन सलीम तो गायब हो चुके थे। पुलिस ने सलीम को खोजने की बहुत कोशिश की, यहां तक कि अखबारों में विज्ञापन भी दिये गये। लेकिन सलीम तो निकल चुके थे । वो इंग्लैंड में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार हशीम के साथ मिस्र की राजधानी कायरो के रास्ते लंदन की तरफ निकल पड़े। लंदन में कुछ दिन बिताने के बाद उन्होंने हशीम के कहने पर स्कॉटलैंड के सबसे बड़े और मशहूर क्लब सेल्टिक के लिये ऑडिशन देने का फैसला किया।
सेल्टिक के मैनेजर विली मैले ने पहले तो नंगे पैर खेलने वाले भारतीय खिलाड़ी को लेने में हिचकिचाहट दिखाई लेकिन हशीम के जोर डालने पर वो ऑडिशन के लिये तैयार हो गये। और उन्होंने सलीम से क्लब के 1000 सदस्यों और तीन कोचों के सामने ऑडिशन देने के लिये कहा।
सलीम ने ऑडिशन में गेंद को कंट्रोल करने की अपनी क्षमता और खेल से सभी को प्रभावित कर दिया। उन्होंने टीम के साथ दो फ्रेंडली मैच खेले जिनमें उन्होंने इतना धमाकेदार प्रदर्शन किया किया कि वहां के मशहूर अखबार स्कॉटिश डेली एक्सप्रेस ने अपने उस दिन के अखबार में इंडियन जगलर न्यू स्टाइल हेडिंग के साथ इनकी तारीफ में लंबा आर्टिकल लिखा। और इस तरह वो किसी यूरोपियन लीग मे खेलने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के पहले खिलाड़ी बन गये।
लेकिन ये जादूगर सेल्टिक के लिये प्रतिस्पर्धी मैच नहीं खेल पाया क्योंकि उनकी तबीयत खराब होने लगी और उन्होंने घर वापस आने के लिये क्लब के मैनेजर से कहा। हालांकि उन लोगों ने सलीम को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन जब सलीम नहीं माने तो क्लब ने उनके सम्मान में एक प्रदर्शनी मैच कराने और मैच की टिकटों के जरिये कुल कमाई का 5 प्रतिशत उन्हें देने की बात कही। लेकिन सलीम ने पैसे लेने से इनकार करते हुये उसे मैच देखने आये अनाथ लोगों में बंटवा दिया।
उस वक्त ये रकम 1800 यूरो यानि लगभग 12 लाख रुपये थी। दोस्तों सोचो जरा उस वक्त इतने रुपयों से क्या कुछ नहीं किया जा सकता था, लेकिन हमारे सलीम ने जरा भी लालच ना करते हुये वो रकम अनाथों में बंटवा दी और घर चले आये।
वापस आते वक्त उन्हें जर्मन लीग में खेलने का भी ऑफर मिला था लेकिन उन्होंने भारत वापस आकर फिर से मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब ज्वाइन किया। और अगले दो सालों तक उन्हें फिर से कलकत्ता फुटबॉल लीग का चैंपियन बनाया।
काफी सालों बाद जब एक बार सलीम बीमार पड़े तो उनके बेटे राशिद ने सेल्टिक को उनकी हालत बताने के लिये खत लिखा। और पता दोस्तों जवाब में क्या सेल्टिक ने क्या किया? सेल्टिक ने उनकी तबीयत जल्द ठीक होने की शुभकामनाओं के साथ इलाज के लिये 100 यूरो का बैंकड्रॉफ्ट भी भेजा। इससे पता चलता है कि वो कितने बड़े खिलाड़ी थे और सेल्टिक में उनकी कितनी इज्जत थी।
1976 में सलीम को पहला बिधान चंद्र रॉय अवार्ड भी मिला। बाद में सन् 1980 में 76 साल की उम्र में सलीम की मौत हो गई। लेकिन दोस्तों आप सोच भी नहीं सकते कि हमने इस लीजेंड के साथ क्या किया? हमारे देश में सलीम को जानने वाले लोग बहुत ही कम हैं जबकि विदेशों मे जब भी इंडियन फुटबॉल की बात होती है तो सबसे पहले सलीम का ही नाम आता है। और सेल्टिक ने तो अपनी वेबसाइट पर आज भी सलीम का नाम बड़े गर्व से लिखा हुआ है।